राजेन्द्र द्विवेदी, यूरीड मीडिया- SIR से लेकर मतदाता सूची, Form-6, चुनावी सॉफ्टवेयर और आयुक्तों के बीच दर्ज आपत्तियों तक—चुनाव आयोग को लेकर उठे सवाल अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं रह गए हैं। असली बहस चुनावी संस्था की पारदर्शिता, निर्णय प्रक्रिया और जनता के भरोसे की है।
भारत में चुनाव सिर्फ सत्ता बदलने की प्रक्रिया नहीं हैं। यह वह संवैधानिक व्यवस्था है जिसके जरिए आम नागरिक अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं। इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में चुनाव आयोग है। इसलिए आयोग के किसी निर्णय पर उठे सवाल केवल सामान्य विवाद नहीं होते बल्कि उनका सीधा संबंध मतदाता के अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास से जुड़ जाता है।
वर्तमान में चुनाव आयोग तीन सदस्यीय है—मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी। लेकिन पिछले कुछ महीनों में इन तीनों के कार्यकाल से जुड़े विवादों ने आयोग के कामकाज पर एक नई बहस खड़ी कर दी है।
पहला सवाल—SIR आखिर इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना ?
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision—SIR का उद्देश्य मतदाता सूची का पुनरीक्षण और शुद्धिकरण करना है। चुनाव आयोग लंबे समय से मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया चलाता रहा है। 2026 में SIR की प्रक्रिया कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंची। आयोग ने इसके लिए अलग-अलग राज्यों का कार्यक्रम भी जारी किया है।
विवाद तब गहरा हुआ जब मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर राजनीतिक दलों और सामाजिक संस्थाओं ने सवाल उठाए। विपक्ष ने प्रक्रिया, दस्तावेजों और गलत तरीकों से नाम हटाने पर सवाल उठाए, जबकि आयोग ने अपनी प्रक्रिया का पूर्ण रूप से बचाव किया।
यहां यह समझना जरूरी है—मतदाता सूची का पुनरीक्षण अपने आप में विवाद नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मृत, स्थानांतरित या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाना भी आवश्यक है। लेकिन विवाद तब पैदा होता है जब किसी वास्तविक मतदाता को यह भरोसा न रहे कि उसका नाम किस आधार पर हटाया गया या उसे वापस जोड़ने की प्रक्रिया क्या है ? कितनी आसान और पारदर्शी है।
दूसरा सवाल—क्या आयोग के भीतर भी मतभेद हैं?
सितंबर 2026 में सामने आई The Indian Express की एक विस्तृत रिपोर्ट ने इस बहस को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले लगभग दस महीनों में कम-से-कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में कहा गया कि ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता नाम हटाने, Form-6 में बदलाव और मतदाता डेटाबेस तथा सॉफ्टवेयर के नियंत्रण जैसे विषयों से जुड़ी थीं।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने संबंधित प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज कीं और मतदाता डेटाबेस के अत्यधिक केंद्रीकरण पर चिंता जताई। यदि ये आपत्तियां दस्तावेजों में दर्ज हैं, तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार एकमत फैसला कैसे कर सकते हैं ? बहुमत के आधार पर भी ज्ञानेश कुमार अल्पमत हैं और नियम भी यही कहता है किसी भी मतभेद के स्थिति में फैसला बहुमत से लिया जायेगा।
तीसरा सवाल—Form-6 और तकनीक का बढ़ता प्रभाव
नए मतदाता के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में SIR से संबंधित अतिरिक्त घोषणा को लेकर भी विवाद सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, नए मतदाताओं से पिछले SIR की मतदाता सूची में स्वयं या माता-पिता/दादा-दादी के नाम से संबंधित जानकारी मांगी गई। रिपोर्ट में दोनों चुनाव आयुक्तों की इस बदलाव को लेकर आपत्तियों का उल्लेख है।
यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज चुनावी प्रक्रिया तेजी से डिजिटल हो रही है। मतदाता सूची, पंजीकरण, सत्यापन और चुनाव प्रबंधन में सॉफ्टवेयर की भूमिका लगातार बढ़ रही है। तकनीक प्रक्रिया को तेज और अधिक व्यवस्थित बना सकती है, लेकिन इसके साथ एक नया सवाल भी पैदा होता है—यदि किसी अधिकारी को किसी मतदाता का नाम जोड़ने या हटाने में तकनीकी बाधित करती है, तो अंतिम जवाबदेही किसकी होगी?
चुनाव आयोग की आधिकारिक मतदाता सेवा व्यवस्था में SIR, Form-6, नाम खोजने और दस्तावेज जमा करने जैसी डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसलिए डिजिटल सिस्टम की पारदर्शिता अब चुनावी निष्पक्षता की बहस का हिस्सा बन चुकी है।
चौथा सवाल—आयुक्तों की नियुक्ति व्यवस्था
विवाद केवल मौजूदा आयोग के निर्णयों तक सीमित नहीं है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की नई व्यवस्था भी न्यायिक जांच के दायरे में है। 2023 के कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनी चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया। इस व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ के न्यायाधीशों के बीच मतभेद सामने आया और मामला बड़ी पीठ के गठन के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया।
इस सुनवाई में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने यह सवाल भी रेखांकित किया कि चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उसका स्वतंत्र दिखाई देना भी महत्वपूर्ण है। यही बात मौजूदा विवाद की केंद्रीय कड़ी बन जाती है। सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं, संस्था का है
ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—तीनों के संबंध में सार्वजनिक बहस अलग-अलग मुद्दों पर हो सकती है। लेकिन उन्हें किसी व्यक्तिगत राजनीतिक खांचे में रख देना इस पूरे विवाद को छोटा कर देगा। आयोग की ओर से यह भी कहा गया है कि SIR और अन्य निर्णयों पर तीनों आयुक्तों की स्वीकृति रही और निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। लोकतंत्र में चुनाव आयोग की सबसे बड़ी पूंजी उसका अधिकार नहीं, उसकी विश्वसनीयता है। मतदाता को यह विश्वास होना चाहिए कि उसका नाम सूची में है तो वह सुरक्षित है; हटाया गया है तो भी कारण स्पष्ट होना चाहिए और चुनाव आयोग का हर निर्णय कानून तथा समान प्रक्रिया के आधार पर लिया गया है।
आने वाले समय में SIR, मतदाता सूची, डिजिटल चुनावी प्रणालियों और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति व्यवस्था पर न्यायिक तथा संस्थागत प्रक्रियाएं इन सवालों को और स्पष्ट कर सकती हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि चुनाव आयोग पर चल रही बहस किसी भी चुनाव से बड़ी है। यह बहस भारतीय लोकतंत्र के उस भरोसे की है, जिसे हर चुनाव के साथ फिर से हासिल करना पड़ता है।
भारत में चुनाव सिर्फ सत्ता बदलने की प्रक्रिया नहीं हैं। यह वह संवैधानिक व्यवस्था है जिसके जरिए आम नागरिक अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं। इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में चुनाव आयोग है। इसलिए आयोग के किसी निर्णय पर उठे सवाल केवल सामान्य विवाद नहीं होते बल्कि उनका सीधा संबंध मतदाता के अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास से जुड़ जाता है।
वर्तमान में चुनाव आयोग तीन सदस्यीय है—मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी। लेकिन पिछले कुछ महीनों में इन तीनों के कार्यकाल से जुड़े विवादों ने आयोग के कामकाज पर एक नई बहस खड़ी कर दी है।
पहला सवाल—SIR आखिर इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना ?
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision—SIR का उद्देश्य मतदाता सूची का पुनरीक्षण और शुद्धिकरण करना है। चुनाव आयोग लंबे समय से मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया चलाता रहा है। 2026 में SIR की प्रक्रिया कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंची। आयोग ने इसके लिए अलग-अलग राज्यों का कार्यक्रम भी जारी किया है।
विवाद तब गहरा हुआ जब मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर राजनीतिक दलों और सामाजिक संस्थाओं ने सवाल उठाए। विपक्ष ने प्रक्रिया, दस्तावेजों और गलत तरीकों से नाम हटाने पर सवाल उठाए, जबकि आयोग ने अपनी प्रक्रिया का पूर्ण रूप से बचाव किया।
यहां यह समझना जरूरी है—मतदाता सूची का पुनरीक्षण अपने आप में विवाद नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मृत, स्थानांतरित या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाना भी आवश्यक है। लेकिन विवाद तब पैदा होता है जब किसी वास्तविक मतदाता को यह भरोसा न रहे कि उसका नाम किस आधार पर हटाया गया या उसे वापस जोड़ने की प्रक्रिया क्या है ? कितनी आसान और पारदर्शी है।
दूसरा सवाल—क्या आयोग के भीतर भी मतभेद हैं?
सितंबर 2026 में सामने आई The Indian Express की एक विस्तृत रिपोर्ट ने इस बहस को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले लगभग दस महीनों में कम-से-कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में कहा गया कि ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता नाम हटाने, Form-6 में बदलाव और मतदाता डेटाबेस तथा सॉफ्टवेयर के नियंत्रण जैसे विषयों से जुड़ी थीं।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने संबंधित प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज कीं और मतदाता डेटाबेस के अत्यधिक केंद्रीकरण पर चिंता जताई। यदि ये आपत्तियां दस्तावेजों में दर्ज हैं, तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार एकमत फैसला कैसे कर सकते हैं ? बहुमत के आधार पर भी ज्ञानेश कुमार अल्पमत हैं और नियम भी यही कहता है किसी भी मतभेद के स्थिति में फैसला बहुमत से लिया जायेगा।
तीसरा सवाल—Form-6 और तकनीक का बढ़ता प्रभाव
नए मतदाता के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में SIR से संबंधित अतिरिक्त घोषणा को लेकर भी विवाद सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, नए मतदाताओं से पिछले SIR की मतदाता सूची में स्वयं या माता-पिता/दादा-दादी के नाम से संबंधित जानकारी मांगी गई। रिपोर्ट में दोनों चुनाव आयुक्तों की इस बदलाव को लेकर आपत्तियों का उल्लेख है।
यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज चुनावी प्रक्रिया तेजी से डिजिटल हो रही है। मतदाता सूची, पंजीकरण, सत्यापन और चुनाव प्रबंधन में सॉफ्टवेयर की भूमिका लगातार बढ़ रही है। तकनीक प्रक्रिया को तेज और अधिक व्यवस्थित बना सकती है, लेकिन इसके साथ एक नया सवाल भी पैदा होता है—यदि किसी अधिकारी को किसी मतदाता का नाम जोड़ने या हटाने में तकनीकी बाधित करती है, तो अंतिम जवाबदेही किसकी होगी?
चुनाव आयोग की आधिकारिक मतदाता सेवा व्यवस्था में SIR, Form-6, नाम खोजने और दस्तावेज जमा करने जैसी डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसलिए डिजिटल सिस्टम की पारदर्शिता अब चुनावी निष्पक्षता की बहस का हिस्सा बन चुकी है।
चौथा सवाल—आयुक्तों की नियुक्ति व्यवस्था
विवाद केवल मौजूदा आयोग के निर्णयों तक सीमित नहीं है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की नई व्यवस्था भी न्यायिक जांच के दायरे में है। 2023 के कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनी चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया। इस व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ के न्यायाधीशों के बीच मतभेद सामने आया और मामला बड़ी पीठ के गठन के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया।
इस सुनवाई में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने यह सवाल भी रेखांकित किया कि चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उसका स्वतंत्र दिखाई देना भी महत्वपूर्ण है। यही बात मौजूदा विवाद की केंद्रीय कड़ी बन जाती है। सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं, संस्था का है
ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—तीनों के संबंध में सार्वजनिक बहस अलग-अलग मुद्दों पर हो सकती है। लेकिन उन्हें किसी व्यक्तिगत राजनीतिक खांचे में रख देना इस पूरे विवाद को छोटा कर देगा। आयोग की ओर से यह भी कहा गया है कि SIR और अन्य निर्णयों पर तीनों आयुक्तों की स्वीकृति रही और निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। लोकतंत्र में चुनाव आयोग की सबसे बड़ी पूंजी उसका अधिकार नहीं, उसकी विश्वसनीयता है। मतदाता को यह विश्वास होना चाहिए कि उसका नाम सूची में है तो वह सुरक्षित है; हटाया गया है तो भी कारण स्पष्ट होना चाहिए और चुनाव आयोग का हर निर्णय कानून तथा समान प्रक्रिया के आधार पर लिया गया है।
आने वाले समय में SIR, मतदाता सूची, डिजिटल चुनावी प्रणालियों और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति व्यवस्था पर न्यायिक तथा संस्थागत प्रक्रियाएं इन सवालों को और स्पष्ट कर सकती हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि चुनाव आयोग पर चल रही बहस किसी भी चुनाव से बड़ी है। यह बहस भारतीय लोकतंत्र के उस भरोसे की है, जिसे हर चुनाव के साथ फिर से हासिल करना पड़ता है।
29th September, 2026
