अरुण कुमार त्रिपाठी- तीस जनवरी 1948 को शाम के 5 बजकर 17 मिनट पर दिल्ली के बिड़ला भवन में महात्मा गांधी की हत्या हुई थी। उस घटना को अन्य शहीदों की स्मृति से जोड़कर इस दिन शहीद दिवस मनाया जाता है और दिन के 11 बजे जब साइरन बजता है तो कम से कम सरकारी दफ्तरों और स्कूलों में लोग खड़े होकर दो मिनट का मौन रखते हैं। इस दिन राष्ट्राध्यक्ष दिल्ली में राजघाट स्थित गांधीजी की समाधि पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। पता नहीं 1955 से शुरू हुए इस स्मरण कार्यक्रम को अब किस भावना के साथ मनाया जाता है और कितना मनाया जाता है? लेकिन जितना भी मनाया जा रहा है उसमें पवित्र भावना से अधिक पाखंड की भावना दिखती है। बल्कि यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हम महात्मा गांधी समेत भगत सिंह जैसे अमर शहीदों के आदर्शों की रोज जिस तरह से हत्या कर रहे हैं उसमें इसे मनाने का मामला महज रस्मी होकर रह गया है।
लोगों के दिमाग में अनैतिहासिक तरीके से यह तथ्य ठूंस कर भरा गया है कि गांधीजी ने भगत सिंह को फांसी के फंदे से न बचाकर, सुभाष बाबू को देश निकाला देकर और पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपए दिलाकर जो अपराध किया था उसी लिए नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या की थी। स्वाधीनता संग्राम के महापुरुषों के मतभेदों को उनकी दुश्मनी बताकर आज उनकी विरासत और उनके आदर्शों को जिस प्रकार सांप्रदायिक आधार पर बांटा जा रहा है उससे हमारे राष्ट्र होने पर संदेह गहराता जा रहा है और खंडित होती जा रही है राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया। यह तथ्य शीशे की तरह साफ है कि गांधी ने भगत सिंह को बचाने के लिए वायसराय लार्ड इरविन से अनुरोध किया था और कहा था कि उन लोगों को फांसी देने से साम्राज्य का अहित होगा। लेकिन निर्णय गांधी के हाथ में नहीं था बल्कि वायसराय के हाथ में था जो वायसराय ने नहीं माना। इसी के साथ यह भी तथ्य है कि भगत सिंह स्वयं फांसी से बचना नहीं चाहते थे और उन्होंने इस कोशिश पर अपने पिता से भी कठोर वचन कहे थे। उनके पिता किशन सिंह संधू कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे। कांग्रेस के कराची अधिवेशन में क्रांतिकारियों की फांसी पर शोक जताए जाने के साथ गांधी ने भगत सिंह की फांसी को सर्वोच्च बलिदान बताया था। इसी के साथ हकीकत यह भी है गांधी इरविन समझौते को अंग्रेज वायसराय ने ठीक से लागू नहीं किया।
जहां तक सुभाष बाबू की बात है तो आजादी की लड़ाई के तरीकों पर उनका और गांधी का मतभेद जगजाहिर है लेकिन आजादी के बाद किस तरह का भारत बनाना है इस पर न तो गांधी और भगत सिंह में व्यापक मतभेद सामने आता है न ही गांधी और सुभाष में। सुभाष बाबू ने गांधी को रंगून रेडियो से राष्ट्रपिता कहा था यह तो बहु चर्चित तथ्य है, इसी के साथ यह बात भी कम बताई जाती है कि उन्होंने आजाद हिंद फौज के सेनानियों से कहा था कि जब मैं न रहूं तो आप लोग गांधी के पास ही जाना और मैं तो यह लड़ाई जीत कर देश को गांधी को सौंपना चाहता हूं। आजाद हिंद फौज के लोग गांधी के पास आए और उनका मुकदमा नेहरू और तेज बहादुर सप्रू जैसे कांग्रेस के बड़े नेताओं ने लड़ा था। गांधी ने भी 23 जनवरी 1948 को उनके जन्मदिन पर आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि मुझे उनका विरोधी माना जाता है पर मैं उन्हें अपना ऐसा पुत्र मानता हूं जिसे मैं अपनी बात समझा नहीं सका। लेकिन वे भी सर्वधर्म समभाव पर आधारित वैसा ही समावेशी भारत बनाना चाहते थे जैसा मैं बनाना चाहता हूं। एक बार अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर ने गांधी से पूछा कि आप उस सुभाष चंद्र का बचाव क्यों करते हैं जो नाजीवादी हिटलर और फासीवादी मुसोलिनी के साथ खड़ा होता है, तो गांधी का कहना था तुम नहीं जानते कि सारे राजनेता ऐसे ही होते हैं। तथ्य यह भी है कि गांधी ने पाकिस्तान को 55 करोड़ दिए जाने का समर्थन जरूर किया था लेकिन कभी उसे अपने अनशन का विषय नहीं बनाया। सवाल है कि सर्वधर्म समभाव का निरादर करके मौजूदा सत्ताधारी और उनके समर्थक कौन सा भारत बनाना चाहते हैं जो शहीदों के सपनों के अनुरूप होगा। क्योंकि शहीद तो जनता के लिए लड़ रहे थे न कि पूंजीपतियों के लिए। जो बात राजघाट पर खुदी गांधी की ताबीज में उल्लिखित है।
आज उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्यों के वातावरण को देखकर लगता है कि जब हम शहीदों के आदर्शों के विपरीत दिशा में जाने का संकल्प कर चुके हैं तो शहीद दिवस मनाने और राजघाट पर गांधी समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करने का क्या अर्थ बनता है। राजघाट पर उन राष्ट्राध्यक्षों के जाने का भी औचित्य नहीं बनता जो या तो युद्ध में शामिल हैं या फिर तमाम तरह के दुराचरणों में। उत्तराखंड में धर्मांतरण के नाम पर झूठे मुकदमों की लहर आई हुई है। जबकि अदालतें उन्हें निराधार बताकर न सिर्फ जमानतें दे रही हैं बल्कि खारिज भी कर रही हैं। शब्दों के साथ धार्मिक पहचान जोड़कर हिंसा की जा रही है। संविधान के पक्ष में खड़े होकर मुकाबला करने वाले संगठित हिंसा के शिकार हो रहे हैं। कहीं वहां शाल बेचने वाले कश्मीरियों को मारा जा रहा है तो कहीं पूर्वोत्तर के युवाओं को चिंकी बताकर पीट पीट कर मार डाला जा रहा है। यही हाल उत्तर प्रदेश में भी है। बुलडोजर न्याय और विकास तो बनारस और दूसरी जगहों अपनी रफ्तार से चल ही रहा है लेकिन बस्ती जिले में एक प्रतिष्ठित पत्रकार परिवार को धर्मांतरण कराने के झूठे आरोपों के आधार पर निशाना बनाया जा रहा है। एक गुंडे ने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों से वसूली करने के लिए प्रशासन के माध्यम से उन सबको देशद्रोही और सांप्रदायिक साबित करना शुरू कर दिया जो समाज में मेल मिलाप के साथ रह रहे थे। विडंबना यह है कि समाज में जितनी तेजी से नफरत फैलाने और शहीदों के आदर्शो को धूमिल करने का अभियान चल रहा है उतनी तेजी से आजाद भारत के आदर्शों का स्मरण दिलाने की कोशिश नहीं चल रही है। हालांकि यह देखकर अवश्य आश्चर्य होता है कि आजकल महात्मा गांधी को पढ़ने और उन पर लिखने वालों की संख्या बढ़ रही है। गांधी से होने वाली सारी दिक्कत उनकी नैतिकता में निहित है। अगर गांधी झूठ और छल कपट की राजनीति किए होते तो संभवतः आज के सत्ताधारियों के लिए सबसे मुफीद होते। लेकिन गांधी की राजनीति पैगंबरी राजनीति थी जो अपने नैतिक मूल्यों से अपने युग की समस्याओं का समाधान करना चाहती थी। उन्होंने अपने युग में अपना प्रभाव पैदा भी किया। लेकिन सांप्रदायिक शक्तियों और हिंसा के आधार पर राज्य करने वाली पूंजीवादी और सामंती शक्तियों के लिए उनकी अहिंसा की शक्ति एक चुनौती बन गई। इसीलिए वे मारे गए।
लोग मानें या न मानें लेकिन ऐतिहासिक अनुभव यही है कि झूठ और हिंसा पर आधारित शक्तियां नैतिकता और अहिंसा पर आधारित ताकतों से बहुत डरती हैं। इसीलिए वे कभी ईसा मसीह को शूली पर लटकाती हैं, सुकरात को जहर का प्याला थमाती हैं, अब्राहम लिंकन को मारती हैं, मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या कर देती हैं और जान एफ कैनेडी को मार डालती हैं। भारत इस समय सत्य और असत्य, हिंसा और अहिंसा, प्रेम और घृणा के बीच गहरे द्वंद्व से गुजर रहा है।
जो लोग सोचते हैं कि वे शहीद दिवस पर शहीदों के आपसी संबंधों के बारे में झूठ फैलाकर और समाज में उनके आदर्शों को कुचल कर उनका कुछ बिगाड़ लेंगे वे भूल कर रहे हैं। चाहे गांधी हों, भगत सिंह हों या सुभाष बाबू हों वे अपने अपने नैतिक आदर्शों और बलिदानों के साथ इतिहास के सौर मंडल में उच्च स्थान के साथ सुरक्षित हैं। नुकसान जो होना है तो वह अपने आज के राष्ट्र का होना है, आज के उस समाज का होना है जिसने जिसने भ्रष्ट और अनैतिक नेताओं को दृढ़ मानकर अपना सारा भरोसा उन्हीं में कर लिया है। भारत आस्तिकता और अवतारवाद में विश्वास करने वाला देश रहा है। हालांकि यहां नास्तिकता वाले बौद्ध और जैन धर्म-दर्शन भी हैं। जहां ईश्वर का अस्तित्व नहीं है। आज नैतिकता रहित इस वातावरण में जहां संवैधानिक मूल्यों की अवहेलना की होड़ लगी है, वहां भविष्य तो क्या वर्तमान ही सुरक्षित नहीं है और फिलहाल कोई अवतार भी होता नहीं दिखता। कभी जर्मन दार्शनिक फेडरिक नीत्से ने कहा था कि ईश्वर की मृत्यु से पूरा ब्रह्मांड असंतुलित हो गया है। वह तब तक संतुलित नहीं होगा जब तक मनुष्य उसके सिंहासन पर नहीं बैठ जाता। लेकिन फ्रांसीसी चिंतक आंद्रे जिदे कहते हैं यह ईश्वर कुछ और नहीं बल्कि नैतिकता है। सुभाष बाबू तो आस्तिक थे लेकिन भगत सिंह नास्तिक थे। जबकि गांधी सत्य को ही ईश्वर मानने लगे थे और उन्हें नास्तिकों से कोई परेशानी नहीं थी। इसलिए सवाल उठता है कि गांधी और हमारे अमर शहीदों ने नैतिकता पर आधारित जिस राष्ट्र का निर्माण करना चाहा था या राष्ट्र के सिंहासन पर नैतिकता को बिठाना चाहा था, वह राष्ट्र अनैतिकता को सिंहासन पर बिठाकर कितनी दूर तक चल पाएगा?
लोगों के दिमाग में अनैतिहासिक तरीके से यह तथ्य ठूंस कर भरा गया है कि गांधीजी ने भगत सिंह को फांसी के फंदे से न बचाकर, सुभाष बाबू को देश निकाला देकर और पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपए दिलाकर जो अपराध किया था उसी लिए नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या की थी। स्वाधीनता संग्राम के महापुरुषों के मतभेदों को उनकी दुश्मनी बताकर आज उनकी विरासत और उनके आदर्शों को जिस प्रकार सांप्रदायिक आधार पर बांटा जा रहा है उससे हमारे राष्ट्र होने पर संदेह गहराता जा रहा है और खंडित होती जा रही है राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया। यह तथ्य शीशे की तरह साफ है कि गांधी ने भगत सिंह को बचाने के लिए वायसराय लार्ड इरविन से अनुरोध किया था और कहा था कि उन लोगों को फांसी देने से साम्राज्य का अहित होगा। लेकिन निर्णय गांधी के हाथ में नहीं था बल्कि वायसराय के हाथ में था जो वायसराय ने नहीं माना। इसी के साथ यह भी तथ्य है कि भगत सिंह स्वयं फांसी से बचना नहीं चाहते थे और उन्होंने इस कोशिश पर अपने पिता से भी कठोर वचन कहे थे। उनके पिता किशन सिंह संधू कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे। कांग्रेस के कराची अधिवेशन में क्रांतिकारियों की फांसी पर शोक जताए जाने के साथ गांधी ने भगत सिंह की फांसी को सर्वोच्च बलिदान बताया था। इसी के साथ हकीकत यह भी है गांधी इरविन समझौते को अंग्रेज वायसराय ने ठीक से लागू नहीं किया।
जहां तक सुभाष बाबू की बात है तो आजादी की लड़ाई के तरीकों पर उनका और गांधी का मतभेद जगजाहिर है लेकिन आजादी के बाद किस तरह का भारत बनाना है इस पर न तो गांधी और भगत सिंह में व्यापक मतभेद सामने आता है न ही गांधी और सुभाष में। सुभाष बाबू ने गांधी को रंगून रेडियो से राष्ट्रपिता कहा था यह तो बहु चर्चित तथ्य है, इसी के साथ यह बात भी कम बताई जाती है कि उन्होंने आजाद हिंद फौज के सेनानियों से कहा था कि जब मैं न रहूं तो आप लोग गांधी के पास ही जाना और मैं तो यह लड़ाई जीत कर देश को गांधी को सौंपना चाहता हूं। आजाद हिंद फौज के लोग गांधी के पास आए और उनका मुकदमा नेहरू और तेज बहादुर सप्रू जैसे कांग्रेस के बड़े नेताओं ने लड़ा था। गांधी ने भी 23 जनवरी 1948 को उनके जन्मदिन पर आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि मुझे उनका विरोधी माना जाता है पर मैं उन्हें अपना ऐसा पुत्र मानता हूं जिसे मैं अपनी बात समझा नहीं सका। लेकिन वे भी सर्वधर्म समभाव पर आधारित वैसा ही समावेशी भारत बनाना चाहते थे जैसा मैं बनाना चाहता हूं। एक बार अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर ने गांधी से पूछा कि आप उस सुभाष चंद्र का बचाव क्यों करते हैं जो नाजीवादी हिटलर और फासीवादी मुसोलिनी के साथ खड़ा होता है, तो गांधी का कहना था तुम नहीं जानते कि सारे राजनेता ऐसे ही होते हैं। तथ्य यह भी है कि गांधी ने पाकिस्तान को 55 करोड़ दिए जाने का समर्थन जरूर किया था लेकिन कभी उसे अपने अनशन का विषय नहीं बनाया। सवाल है कि सर्वधर्म समभाव का निरादर करके मौजूदा सत्ताधारी और उनके समर्थक कौन सा भारत बनाना चाहते हैं जो शहीदों के सपनों के अनुरूप होगा। क्योंकि शहीद तो जनता के लिए लड़ रहे थे न कि पूंजीपतियों के लिए। जो बात राजघाट पर खुदी गांधी की ताबीज में उल्लिखित है।
आज उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्यों के वातावरण को देखकर लगता है कि जब हम शहीदों के आदर्शों के विपरीत दिशा में जाने का संकल्प कर चुके हैं तो शहीद दिवस मनाने और राजघाट पर गांधी समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करने का क्या अर्थ बनता है। राजघाट पर उन राष्ट्राध्यक्षों के जाने का भी औचित्य नहीं बनता जो या तो युद्ध में शामिल हैं या फिर तमाम तरह के दुराचरणों में। उत्तराखंड में धर्मांतरण के नाम पर झूठे मुकदमों की लहर आई हुई है। जबकि अदालतें उन्हें निराधार बताकर न सिर्फ जमानतें दे रही हैं बल्कि खारिज भी कर रही हैं। शब्दों के साथ धार्मिक पहचान जोड़कर हिंसा की जा रही है। संविधान के पक्ष में खड़े होकर मुकाबला करने वाले संगठित हिंसा के शिकार हो रहे हैं। कहीं वहां शाल बेचने वाले कश्मीरियों को मारा जा रहा है तो कहीं पूर्वोत्तर के युवाओं को चिंकी बताकर पीट पीट कर मार डाला जा रहा है। यही हाल उत्तर प्रदेश में भी है। बुलडोजर न्याय और विकास तो बनारस और दूसरी जगहों अपनी रफ्तार से चल ही रहा है लेकिन बस्ती जिले में एक प्रतिष्ठित पत्रकार परिवार को धर्मांतरण कराने के झूठे आरोपों के आधार पर निशाना बनाया जा रहा है। एक गुंडे ने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों से वसूली करने के लिए प्रशासन के माध्यम से उन सबको देशद्रोही और सांप्रदायिक साबित करना शुरू कर दिया जो समाज में मेल मिलाप के साथ रह रहे थे। विडंबना यह है कि समाज में जितनी तेजी से नफरत फैलाने और शहीदों के आदर्शो को धूमिल करने का अभियान चल रहा है उतनी तेजी से आजाद भारत के आदर्शों का स्मरण दिलाने की कोशिश नहीं चल रही है। हालांकि यह देखकर अवश्य आश्चर्य होता है कि आजकल महात्मा गांधी को पढ़ने और उन पर लिखने वालों की संख्या बढ़ रही है। गांधी से होने वाली सारी दिक्कत उनकी नैतिकता में निहित है। अगर गांधी झूठ और छल कपट की राजनीति किए होते तो संभवतः आज के सत्ताधारियों के लिए सबसे मुफीद होते। लेकिन गांधी की राजनीति पैगंबरी राजनीति थी जो अपने नैतिक मूल्यों से अपने युग की समस्याओं का समाधान करना चाहती थी। उन्होंने अपने युग में अपना प्रभाव पैदा भी किया। लेकिन सांप्रदायिक शक्तियों और हिंसा के आधार पर राज्य करने वाली पूंजीवादी और सामंती शक्तियों के लिए उनकी अहिंसा की शक्ति एक चुनौती बन गई। इसीलिए वे मारे गए।
लोग मानें या न मानें लेकिन ऐतिहासिक अनुभव यही है कि झूठ और हिंसा पर आधारित शक्तियां नैतिकता और अहिंसा पर आधारित ताकतों से बहुत डरती हैं। इसीलिए वे कभी ईसा मसीह को शूली पर लटकाती हैं, सुकरात को जहर का प्याला थमाती हैं, अब्राहम लिंकन को मारती हैं, मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या कर देती हैं और जान एफ कैनेडी को मार डालती हैं। भारत इस समय सत्य और असत्य, हिंसा और अहिंसा, प्रेम और घृणा के बीच गहरे द्वंद्व से गुजर रहा है।
जो लोग सोचते हैं कि वे शहीद दिवस पर शहीदों के आपसी संबंधों के बारे में झूठ फैलाकर और समाज में उनके आदर्शों को कुचल कर उनका कुछ बिगाड़ लेंगे वे भूल कर रहे हैं। चाहे गांधी हों, भगत सिंह हों या सुभाष बाबू हों वे अपने अपने नैतिक आदर्शों और बलिदानों के साथ इतिहास के सौर मंडल में उच्च स्थान के साथ सुरक्षित हैं। नुकसान जो होना है तो वह अपने आज के राष्ट्र का होना है, आज के उस समाज का होना है जिसने जिसने भ्रष्ट और अनैतिक नेताओं को दृढ़ मानकर अपना सारा भरोसा उन्हीं में कर लिया है। भारत आस्तिकता और अवतारवाद में विश्वास करने वाला देश रहा है। हालांकि यहां नास्तिकता वाले बौद्ध और जैन धर्म-दर्शन भी हैं। जहां ईश्वर का अस्तित्व नहीं है। आज नैतिकता रहित इस वातावरण में जहां संवैधानिक मूल्यों की अवहेलना की होड़ लगी है, वहां भविष्य तो क्या वर्तमान ही सुरक्षित नहीं है और फिलहाल कोई अवतार भी होता नहीं दिखता। कभी जर्मन दार्शनिक फेडरिक नीत्से ने कहा था कि ईश्वर की मृत्यु से पूरा ब्रह्मांड असंतुलित हो गया है। वह तब तक संतुलित नहीं होगा जब तक मनुष्य उसके सिंहासन पर नहीं बैठ जाता। लेकिन फ्रांसीसी चिंतक आंद्रे जिदे कहते हैं यह ईश्वर कुछ और नहीं बल्कि नैतिकता है। सुभाष बाबू तो आस्तिक थे लेकिन भगत सिंह नास्तिक थे। जबकि गांधी सत्य को ही ईश्वर मानने लगे थे और उन्हें नास्तिकों से कोई परेशानी नहीं थी। इसलिए सवाल उठता है कि गांधी और हमारे अमर शहीदों ने नैतिकता पर आधारित जिस राष्ट्र का निर्माण करना चाहा था या राष्ट्र के सिंहासन पर नैतिकता को बिठाना चाहा था, वह राष्ट्र अनैतिकता को सिंहासन पर बिठाकर कितनी दूर तक चल पाएगा?
6th February, 2026
