यूरीड मीडिया- इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने उत्तर प्रदेश में पुलिस एनकाउंटर की कार्यशैली और बढ़ती 'एनकाउंटर संस्कृति' पर कड़ा रुख अपनाते हुए 11 पन्नों का एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। न्यायालय ने वर्ष 2016 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले (पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य) का हवाला देते हुए पुलिस को सख्त दिशा-निर्देशों का पालन करने को कहा है।
इस आदेश के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. एनकाउंटर के बाद की प्रक्रिया और FIR
अनिवार्य FIR: यदि पुलिस एनकाउंटर में आरोपी या किसी अन्य व्यक्ति को गंभीर चोट आती है, तो उस घटना की अलग से FIR दर्ज करना अनिवार्य होगा।
जांच का अधिकार: यह FIR भले ही उसी थाने या नजदीकी थाने में दर्ज हो, लेकिन इसकी जांच संबंधित थाने की पुलिस नहीं करेगी। जांच का जिम्मा CBCID या किसी अन्य थाने की पुलिस टीम को सौंपा जाएगा।
जांच अधिकारी का स्तर: जांच एक वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में होगी, जो एनकाउंटर करने वाली टीम के प्रभारी से कम से कम एक स्तर ऊपर का अधिकारी होना चाहिए।
आरोपी का नाम: प्रारंभिक FIR में पुलिसकर्मियों को व्यक्तिगत रूप से आरोपी बनाना आवश्यक नहीं है; केवल यह उल्लेख पर्याप्त होगा कि एनकाउंटर STF या पुलिस बल द्वारा किया गया।
2. मेडिकल सहायता और बयान
घायल आरोपी को तत्काल चिकित्सा सहायता प्रदान करना पुलिस का अनिवार्य कर्तव्य है।
इलाज के बाद, डॉक्टर द्वारा शारीरिक स्थिति की पुष्टि होने पर, मजिस्ट्रेट या मेडिकल अधिकारी द्वारा घायल का बयान दर्ज किया जाना आवश्यक है।
3. प्रमोशन और वीरता पुरस्कार पर रोक
न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि एनकाउंटर के तुरंत बाद किसी भी पुलिसकर्मी को 'आउट ऑफ टर्न' प्रमोशन या वीरता पुरस्कार नहीं दिया जाएगा।
ऐसे पुरस्कारों पर तभी विचार होगा जब पुलिस प्रमुख द्वारा गठित स्वतंत्र समिति यह पुष्टि कर दे कि संबंधित अधिकारी की वीरता संदेह से परे है।
4. वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही
यदि किसी जिले में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन पाया जाता है, तो केवल एनकाउंटर टीम ही नहीं, बल्कि जिले के पुलिस प्रमुख (SP, SSP या पुलिस कमिश्नर) भी अवमानना कार्यवाही (Contempt of Court) के लिए जिम्मेदार होंगे।
इसके अलावा, दोषी अधिकारियों के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही भी की जाएगी।
5. 'हाफ एनकाउंटर' और पुलिस की भूमिका पर टिप्पणी
हाईकोर्ट ने तथाकथित 'ऑपरेशन लंगड़ा' या 'हाफ एनकाउंटर' (पैर में गोली मारना) की प्रवृत्ति पर कड़ी आपत्ति जताई।
अदालत ने कहा कि पुलिस का काम जांच करना है, दंड देना नहीं। सजा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है।
प्रसिद्धि, सोशल मीडिया पर वाहवाही या प्रमोशन के लिए अनावश्यक रूप से हथियारों का प्रयोग करना या आरोपी को अपंग बनाना कानूनन अपराध है और मानवाधिकारों का हनन है।
6. पीड़ित पक्ष के लिए राहत का मार्ग
यदि घायल व्यक्ति या उसके परिजनों को लगता है कि जांच निष्पक्ष नहीं हुई है या प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है, तो वे संबंधित सेशंस जज (Sessions Judge) के समक्ष शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
सेशंस जज मामले की जांच करेंगे और आवश्यकता पड़ने पर इसे हाईकोर्ट को संदर्भित कर सकते हैं।
कानूनी नोट: यह आदेश उस समय आया जब अदालत एक ऐसे आरोपी की जमानत अर्जी पर सुनवाई कर रही थी जिसे एनकाउंटर में गंभीर चोटें आई थीं, जबकि पुलिस पक्ष को कोई खरोंच तक नहीं आई थी। अदालत ने इसे 'शक्ति का असंतुलित प्रयोग' और न्यायिक क्षेत्र में पुलिस का हस्तक्षेप माना है।
31st January, 2026
