डॉक्टर अनिल चतुर्वेदी, यूरीड मीडिया- परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि अपने स्वाध्याय से सभी वेदों को कंठस्थ कर लिया और फिर उन्होंने कौशल के राजा प्रसेनजित के पास जाकर उनकी पुत्री रेणुका से विवाह किया। रेणुका का आचरण सभी प्रकार से अपने पतिदेव के अनुकूल था। रेणुका से उनके 5 पुत्र हुए। जिसमें परशुराम जी सबसे छोटे थे। भाईयों में छोटे होने पर भी यह गुणों में सबसे बढ़ चढ़ के थे। एक दिन आश्रम से जब सब पुत्र जंगल में फल लेने चले गए तो रेणुका माँ स्नान करने के लिए गयी। जिस समय वह स्नान करके आश्रम की ओर लौट रही थी तो उन्होंने भगवान चित्ररथ को अपनी अप्सराओं के साथ जल क्रीड़ा करते देखा। उनकी वैभव एवं संपन्नशीलता देख कर हतप्रभ हुई। साथ ही भगवान चित्ररथ द्वारा अपनी अप्सराओं के साथ प्रणय लीला देखकर उनका भी मन विचलित हो उठा। उनके मन में कुछ विकार पैदा हो गया।
जब रेणुका ने आश्रम में प्रवेश किया तो उनके चेहरे के भाव बदले हुए थे। जमदग्नि मुनि ने उनकी मन की सब बातें जान ली और उनका अधीर एवं आभाहीन चेहरा देखकर उन्हें बहुत धिक्कारा। इतने में ही उनका ज्येष्ठ पुत्र रुक्मवान और फिर सुषेण, वसु और विशवासु भी आ गए। मुनी ने क्रमश: उन सभी पुत्रों से कहा कि अपनी मां को तुरंत मार डालो। वे सभी मां के मोह वश हक्के बक्के से रह गए, कुछ भी न बोल सके। तब मुनि ने क्रोधित होकर उन्हें श्राप दिया जिससे उनकी विचार शक्ति नष्ट हो गयी और वे मृग और पक्षी के सामान जड़बुद्धि हो गए।
"परशुराम के पिता ने जब उनसे कहा कि बेटा इस पापनी माता को अभी मार डालो और इस कार्य के लिए अपने मन में किसी प्रकार का दुःख न महसूस करना। यह सुनकर परशुराम ने कुल्हाड़ी लेकर उसी क्षण अपनी माता का मस्तक काट डाला।" इससे उनके पिता का क्रोध शांत हो गया और उन्होंने प्रसन्न होकर कहा कि, बेटा तुमने मेरे कहने से वह काम किया है, जिसे करना किसी भी पुत्र के लिए बड़ा ही कठिन है, इसलिए तुम्हारी जो-जो इच्छाएं हो वे सभी मांग लो। तब परशुराम जी ने कहा कि मेरी माता जीवित हो जाये, और उनको मेरे द्वारा मारे जाने की बात भी याद न रहे और उनके मन का पाप भी नाश हो जाय, मेरे चारों भाई स्वस्थ हो जाये। युद्ध में मेरा सामना करने वाला कोई न हो और मैं लम्बी आयु को प्राप्त करू।
परमतपस्वी जमदग्नि ने भी वरदान के द्वारा उनकी सभी कामनाएं पूर्ण कर दी। इस तरह से परशुराम ने एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह अपने पिता की बातें मान ली और अपने पिता का जो ब्राह्मणत्व गुणों से पूर्ण थे उनसे आशीर्वाद भी प्राप्त करने में सफल रहे। माना जाता है कि भगवान परशुराम शंकर भगवान के पहले शिष्य थे। उन्होंने अपनी शस्त्र शिक्षा भगवान शिव से ही प्राप्त की थी। जैसे महादेव अपनी जनता एवं परिवार के कल्याण के लिए सभी को एक ही नजरिये से देखा और सभी को बराबरी का मौका दिया और समाज में अन्याय करने वालों को एवं सनातन धर्म की मर्यादा की रक्षा के लिए किसी का वध करने में भी संकोच नहीं किया। यहाँ तक कि उन्होंने अपने पुत्र गणेश जी को आज्ञा न मानने के कारण उनका गला काट दिया। इस तरह से समाज में जो भी अन्यायी, दुष्ट एवं आप्ताई आदि लोग थे उनको भगवान शिव और परशुराम ने समाज हित के लिए दण्डित किया।
जब रेणुका ने आश्रम में प्रवेश किया तो उनके चेहरे के भाव बदले हुए थे। जमदग्नि मुनि ने उनकी मन की सब बातें जान ली और उनका अधीर एवं आभाहीन चेहरा देखकर उन्हें बहुत धिक्कारा। इतने में ही उनका ज्येष्ठ पुत्र रुक्मवान और फिर सुषेण, वसु और विशवासु भी आ गए। मुनी ने क्रमश: उन सभी पुत्रों से कहा कि अपनी मां को तुरंत मार डालो। वे सभी मां के मोह वश हक्के बक्के से रह गए, कुछ भी न बोल सके। तब मुनि ने क्रोधित होकर उन्हें श्राप दिया जिससे उनकी विचार शक्ति नष्ट हो गयी और वे मृग और पक्षी के सामान जड़बुद्धि हो गए।
"परशुराम के पिता ने जब उनसे कहा कि बेटा इस पापनी माता को अभी मार डालो और इस कार्य के लिए अपने मन में किसी प्रकार का दुःख न महसूस करना। यह सुनकर परशुराम ने कुल्हाड़ी लेकर उसी क्षण अपनी माता का मस्तक काट डाला।" इससे उनके पिता का क्रोध शांत हो गया और उन्होंने प्रसन्न होकर कहा कि, बेटा तुमने मेरे कहने से वह काम किया है, जिसे करना किसी भी पुत्र के लिए बड़ा ही कठिन है, इसलिए तुम्हारी जो-जो इच्छाएं हो वे सभी मांग लो। तब परशुराम जी ने कहा कि मेरी माता जीवित हो जाये, और उनको मेरे द्वारा मारे जाने की बात भी याद न रहे और उनके मन का पाप भी नाश हो जाय, मेरे चारों भाई स्वस्थ हो जाये। युद्ध में मेरा सामना करने वाला कोई न हो और मैं लम्बी आयु को प्राप्त करू।
परमतपस्वी जमदग्नि ने भी वरदान के द्वारा उनकी सभी कामनाएं पूर्ण कर दी। इस तरह से परशुराम ने एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह अपने पिता की बातें मान ली और अपने पिता का जो ब्राह्मणत्व गुणों से पूर्ण थे उनसे आशीर्वाद भी प्राप्त करने में सफल रहे। माना जाता है कि भगवान परशुराम शंकर भगवान के पहले शिष्य थे। उन्होंने अपनी शस्त्र शिक्षा भगवान शिव से ही प्राप्त की थी। जैसे महादेव अपनी जनता एवं परिवार के कल्याण के लिए सभी को एक ही नजरिये से देखा और सभी को बराबरी का मौका दिया और समाज में अन्याय करने वालों को एवं सनातन धर्म की मर्यादा की रक्षा के लिए किसी का वध करने में भी संकोच नहीं किया। यहाँ तक कि उन्होंने अपने पुत्र गणेश जी को आज्ञा न मानने के कारण उनका गला काट दिया। इस तरह से समाज में जो भी अन्यायी, दुष्ट एवं आप्ताई आदि लोग थे उनको भगवान शिव और परशुराम ने समाज हित के लिए दण्डित किया।
10th August, 2020
