विजय शंकर पंकज, यूरीड मीडिया- इतिहास विजेता का होता है। विजेता का कृत्य और आचरण को ही इतिहास धर्म और मर्यादा की संज्ञा देता है। युद्ध का परिणाम इतिहास की परिभाषा बदल देते है।भारतीय भौगोलिक परिवेश में दो सबसे बड़े युद्ध परिणाम इतिहास के धर्म और मर्यादा का समीचीन निरूपण करते है।
त्रेता युग में भगवान राम बालि बध का कारण बताते हुए कहते है कि ''अनुज बधू, भगिनी, सूत नारी-रे सठ कन्या सम ये चारी। बालि ने जीत के बाद अपने छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी को भार्या बना लिया।
यहां पर बालि का बध करने के लिए राम पेड़ की आड़ लेकर, छिपकर प्रहार करते है। तब के युद्ध की मर्यादा में शत्रु पर भी छिपकर तथा पीछे से प्रहार करने को अच्छा नही माना गया है। परन्तु विजेता वर्ग तर्क देता है कि धर्म विरूद्ध आचरण करने वालो के खिलाफ छद्म युद्ध भी धर्म के ही अनुकूल है। साफ है कि किसी भी रूप में विजय मिले। इतिहास में उसके लिए अपने पक्ष में तर्क ढूढ लिए जायेगे।
त्रेता युग की अनुज बधू का यह अमर्यादित स्वरूप बदल जाता है। स्वयंबर में द्रौपदी संग अर्जुन से विवाह करने वाली अनुज बधु को युधिष्ठिर भी अपनी पत्नी बना लेते है। इस कुतर्क से बचने के लिए द्रौपदी की शादी पांचो भाइयो से कर दी जाती है। किसी स्त्री की एक बार शादी हो जाने के बाद दोबारा उसकी शादी कैसे होगी? स्वयंबर के बाद द्रौपदी और अर्जुन की शादी द्रुपद के महल में हो गयी। वहां से जब सभी अपने निवास स्थल पर पहुंचते है तो अनजाने में कही गयी पांडवो की मां कुन्ती की बात को दूसरी शादी का आधार बनाया गया। इस पूरे घटनाक्रम में इतिहास का केवल कुतर्क है।
त्रेता युग में अनुज बधु को भार्या बनाने वाले को मृत्यु दण्ड देने वाले राम के निर्णय के खिलाफ भगवान कृष्ण युधिष्ठिर को धर्मराज की संज्ञा देते है। राम और कृष्ण दोनो ही भगवान विष्णु के अंश अवतार है। इतिहास के अनुसार इन दोनो ही महापुरूषो की मान्यता समय के अनुकूल बदल जाती है। यही कह सकते है - यह सब कुछ प्रभु की लीला है।
धर्मराज की मर्यादा का इतिहास और भी अलौकिक है। अनुज बधू से शादी करने के बाद उसी पत्नी और भाइयो को जुए में हार जाते है। जुए का इतना व्यसनी व्यक्ति धर्म का मानक है। यही बात खत्म नही होती। सत्यवादी कहा जाने वाला अपने गुरू की हत्या कराने के लिए द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा की मारे जाने की झूठी घोषणा करता है।
इतिहास किसी को भी महिमा मंडित कर सकता है। जब ऐसे कृत्यो वाले युधिष्ठिर को इतिहास धर्मराज की संज्ञा दे सकता है तो उस समाज में अधर्मियो की स्थिति क्या होगी?
कृष्ण कहते है - "यदा यदा हि धर्मस्य गलानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।।" धर्म की रक्षा करने के लिए मनुज अवतार लेने भगवान के काल के धर्मराज युधिष्ठिर है।
इसी प्रकार त्रेता युग में भगवान राम ''बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।।" का अवतार होता है।
भगवान राम के अवतार का लक्ष्य रावण बध था। केवल त्रेता ही कालावधि तक रावण जैसा विद्वान और वेदपाठी बाह्मण नही हुआ। रावण ब्रााह्मण बंश में उत्तम कुल पुलस्ति के नाती और विश्रश्रवा का पुत्र है। इतिहास का तर्क है रावण देवताओ और संतो के लिए विध्वंसक हो गया था। देवताओं का इतिहास तो हमेशा ही छलकारी और अनैतिक रहा है। देवताओं के राजा इन्द्र जैसा कुकर्मी और व्यभिचारी राजा हुआ ही नही। इन्द्र ने श्रषि पत्नाी अहिल्या के साथ भी व्यभिचार किया परन्तु उसे दण्डित नही किया गया। इसके विपरीत रावण बध में इन्द्र की सहायता ली गयी।
इतिहास जब इन्द्र जैसे कुमार्गी को देवताओं को राजा और युधिष्ठिर को धर्मराज की मान्यता देगा तो उस पर सवालिया निशान लगेगे। सामाजिक मान्यता इतिहास से उपर होती है। इसलिए इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर कई समाज सवाल उठाते रहे है। भगवान राम का नाम लेकर लोगो को संसार से मुक्ति मिल जाती है परन्तु विभिषण को राम का संरक्षण और अभयदान मिलने के बाद भी समाज ने उसे भ्रातद्रोह से मुक्त नही किया। आज भी कोई अपने पुत्र का नाम विभिषण नही रखता।
भगवान राम और कृष्ण अपने काल और सामाजिक मूल्यो के अनुरूप धर्म और मर्यादा का स्वरूप निर्धारित करते है। इन दोनो के काल में भी इनके निर्णयो का विरोध हुआ है। राम अपने काल में वैदिक मान्यता को प्रभावी रखने पर जोर देते है परन्तु राजशाही में भी लोकतंत्र की अवधारणा को बल प्रदान करते है। यही कारण है कि लोक भावना को महत्व देते हुए राजधर्म का पालन करते हुए पत्नी सीता का परित्याग करते है। जिस सीता के लिए राम पूरे ब्रााह्मण रावण बंश का संहार कर देते हुए उसी सीता को एक नागरिक के गलत आरोपो के कारण परित्याग कर देते है।
कृष्ण धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेते है। कृष्ण नवीन व्यवस्था के परिचायक है। कृष्ण पुरानी रूढिवादी परम्पराओं का खुला विरोध ही नही करते, उसके लिए जन चेतना जगाते है। पूजा के नाम पर इन्द्र के टैक्स वसूली अभियान का कृष्ण ने सबसे पहले विरोध किया। गोबर्धन पर्वत उठाने का विवरण इसका परिचायक है कि कृष्ण ने राजसेवा की जगह गोपालक और कृषि को महत्व दिया। यही कृष्ण पुरातन पीढ़ी के भीष्म पितामह तथा द्रोणाचार्य की प्रतिज्ञाओं एवं निष्ठाओं की भी धज्जियां उड़ाते है। कृष्ण उन पाण्डवो का समर्थन करते है जो बार - बार राजसत्ता से सताये जा रहे है। इन पाण्डवो की आड़ में कृष्ण ने तब के धर्म नियन्ताओं की राह ही बदल डाली।
साफ है इतिहास जब भी लिखा जाता है, विजेता को प्रतिष्ठित करने केेेेे लिए होता है। उसके खिलाफ लिखा जाना वाला भाग बाद में समाज से उठती जनभावना का द्योतक होती है।
त्रेता युग में भगवान राम बालि बध का कारण बताते हुए कहते है कि ''अनुज बधू, भगिनी, सूत नारी-रे सठ कन्या सम ये चारी। बालि ने जीत के बाद अपने छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी को भार्या बना लिया।
यहां पर बालि का बध करने के लिए राम पेड़ की आड़ लेकर, छिपकर प्रहार करते है। तब के युद्ध की मर्यादा में शत्रु पर भी छिपकर तथा पीछे से प्रहार करने को अच्छा नही माना गया है। परन्तु विजेता वर्ग तर्क देता है कि धर्म विरूद्ध आचरण करने वालो के खिलाफ छद्म युद्ध भी धर्म के ही अनुकूल है। साफ है कि किसी भी रूप में विजय मिले। इतिहास में उसके लिए अपने पक्ष में तर्क ढूढ लिए जायेगे।
त्रेता युग की अनुज बधू का यह अमर्यादित स्वरूप बदल जाता है। स्वयंबर में द्रौपदी संग अर्जुन से विवाह करने वाली अनुज बधु को युधिष्ठिर भी अपनी पत्नी बना लेते है। इस कुतर्क से बचने के लिए द्रौपदी की शादी पांचो भाइयो से कर दी जाती है। किसी स्त्री की एक बार शादी हो जाने के बाद दोबारा उसकी शादी कैसे होगी? स्वयंबर के बाद द्रौपदी और अर्जुन की शादी द्रुपद के महल में हो गयी। वहां से जब सभी अपने निवास स्थल पर पहुंचते है तो अनजाने में कही गयी पांडवो की मां कुन्ती की बात को दूसरी शादी का आधार बनाया गया। इस पूरे घटनाक्रम में इतिहास का केवल कुतर्क है।
त्रेता युग में अनुज बधु को भार्या बनाने वाले को मृत्यु दण्ड देने वाले राम के निर्णय के खिलाफ भगवान कृष्ण युधिष्ठिर को धर्मराज की संज्ञा देते है। राम और कृष्ण दोनो ही भगवान विष्णु के अंश अवतार है। इतिहास के अनुसार इन दोनो ही महापुरूषो की मान्यता समय के अनुकूल बदल जाती है। यही कह सकते है - यह सब कुछ प्रभु की लीला है।
धर्मराज की मर्यादा का इतिहास और भी अलौकिक है। अनुज बधू से शादी करने के बाद उसी पत्नी और भाइयो को जुए में हार जाते है। जुए का इतना व्यसनी व्यक्ति धर्म का मानक है। यही बात खत्म नही होती। सत्यवादी कहा जाने वाला अपने गुरू की हत्या कराने के लिए द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा की मारे जाने की झूठी घोषणा करता है।
इतिहास किसी को भी महिमा मंडित कर सकता है। जब ऐसे कृत्यो वाले युधिष्ठिर को इतिहास धर्मराज की संज्ञा दे सकता है तो उस समाज में अधर्मियो की स्थिति क्या होगी?
कृष्ण कहते है - "यदा यदा हि धर्मस्य गलानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।।" धर्म की रक्षा करने के लिए मनुज अवतार लेने भगवान के काल के धर्मराज युधिष्ठिर है।
इसी प्रकार त्रेता युग में भगवान राम ''बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।।" का अवतार होता है।
भगवान राम के अवतार का लक्ष्य रावण बध था। केवल त्रेता ही कालावधि तक रावण जैसा विद्वान और वेदपाठी बाह्मण नही हुआ। रावण ब्रााह्मण बंश में उत्तम कुल पुलस्ति के नाती और विश्रश्रवा का पुत्र है। इतिहास का तर्क है रावण देवताओ और संतो के लिए विध्वंसक हो गया था। देवताओं का इतिहास तो हमेशा ही छलकारी और अनैतिक रहा है। देवताओं के राजा इन्द्र जैसा कुकर्मी और व्यभिचारी राजा हुआ ही नही। इन्द्र ने श्रषि पत्नाी अहिल्या के साथ भी व्यभिचार किया परन्तु उसे दण्डित नही किया गया। इसके विपरीत रावण बध में इन्द्र की सहायता ली गयी।
इतिहास जब इन्द्र जैसे कुमार्गी को देवताओं को राजा और युधिष्ठिर को धर्मराज की मान्यता देगा तो उस पर सवालिया निशान लगेगे। सामाजिक मान्यता इतिहास से उपर होती है। इसलिए इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर कई समाज सवाल उठाते रहे है। भगवान राम का नाम लेकर लोगो को संसार से मुक्ति मिल जाती है परन्तु विभिषण को राम का संरक्षण और अभयदान मिलने के बाद भी समाज ने उसे भ्रातद्रोह से मुक्त नही किया। आज भी कोई अपने पुत्र का नाम विभिषण नही रखता।
भगवान राम और कृष्ण अपने काल और सामाजिक मूल्यो के अनुरूप धर्म और मर्यादा का स्वरूप निर्धारित करते है। इन दोनो के काल में भी इनके निर्णयो का विरोध हुआ है। राम अपने काल में वैदिक मान्यता को प्रभावी रखने पर जोर देते है परन्तु राजशाही में भी लोकतंत्र की अवधारणा को बल प्रदान करते है। यही कारण है कि लोक भावना को महत्व देते हुए राजधर्म का पालन करते हुए पत्नी सीता का परित्याग करते है। जिस सीता के लिए राम पूरे ब्रााह्मण रावण बंश का संहार कर देते हुए उसी सीता को एक नागरिक के गलत आरोपो के कारण परित्याग कर देते है।
कृष्ण धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेते है। कृष्ण नवीन व्यवस्था के परिचायक है। कृष्ण पुरानी रूढिवादी परम्पराओं का खुला विरोध ही नही करते, उसके लिए जन चेतना जगाते है। पूजा के नाम पर इन्द्र के टैक्स वसूली अभियान का कृष्ण ने सबसे पहले विरोध किया। गोबर्धन पर्वत उठाने का विवरण इसका परिचायक है कि कृष्ण ने राजसेवा की जगह गोपालक और कृषि को महत्व दिया। यही कृष्ण पुरातन पीढ़ी के भीष्म पितामह तथा द्रोणाचार्य की प्रतिज्ञाओं एवं निष्ठाओं की भी धज्जियां उड़ाते है। कृष्ण उन पाण्डवो का समर्थन करते है जो बार - बार राजसत्ता से सताये जा रहे है। इन पाण्डवो की आड़ में कृष्ण ने तब के धर्म नियन्ताओं की राह ही बदल डाली।
साफ है इतिहास जब भी लिखा जाता है, विजेता को प्रतिष्ठित करने केेेेे लिए होता है। उसके खिलाफ लिखा जाना वाला भाग बाद में समाज से उठती जनभावना का द्योतक होती है।
16th May, 2020
