2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकराने का फैसला सोनिया गांधी की जिंदगी के सबसे चर्चित राजनीतिक फैसलों में से एक रहा है। अपनी किताब ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ में उन्होंने बताया है कि राहुल और प्रियंका भी नहीं चाहते थे कि वे प्रधानमंत्री बनें।
10 नवंबर को लॉन्च होने वाली इस किताब पर ‘द हिंदू’ को दिए इंटरव्यू में सोनिया ने इस फैसले से लेकर राजीव गांधी के साथ अपने रिश्ते, इमरजेंसी, कांग्रेस के भविष्य और देश की मौजूदा राजनीति पर बात की।
प्रश्न 1. आपने हाल ही में सोशल मीडिया पर लिखा कि दशकों से दूसरे लोग आपकी कहानी बताते रहे हैं, लेकिन अब आपकी बारी है। क्या आप दूसरों द्वारा लिखी गई अपनी जीवनियों को लेकर नाराज थीं? क्या आपने उनमें से कुछ किताबें पढ़ी हैं?
सोनिया गांधी:मुझे तो अंदाजा भी नहीं था कि मेरे ऊपर इतनी सारी किताबें लिखी जा चुकी हैं। लेकिन मैंने कभी अपने बारे में लिखी गई किताबें पढ़ने की इच्छा नहीं रखी। बहुत पहले राजीव और मैंने समझ लिया था कि हमारे बारे में जो कुछ भी लिखा जा रहा है, उन सब पर नजर रखने का कोई मतलब नहीं है। हालांकि, जैसा कि मैंने अपनी पुस्तक में बताया है, एक समय ऐसा आया जब मुझे लगा कि मुझे अपनी कहानी स्वयं बतानी चाहिए।
प्रश्न 2.आपकी पुस्तक Belonging में आपने अपनी कहानी लिखने की शुरुआत के बारे में बताया है। क्या वर्षों से लोगों द्वारा आपसे अपनी कहानी बताने की मांग ने आपको यह पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित किया या इसके पीछे आपकी अपनी कोई भावना थी? इसे लिखने में कितना समय लगा?
सोनिया गांधी:यह इतना लंबा समय रहा है कि अब मुझे ठीक से याद भी नहीं कि कब शुरुआत हुई थी। लेकिन निश्चित रूप से मैंने एक दशक से भी पहले कुछ लिखना शुरू कर दिया था। गंभीरता से लिखना मैंने लगभग पांच वर्ष पहले शुरू किया। यह लगातार चलने वाली प्रक्रिया नहीं थी। कई बार विचार और शब्द सहज रूप से निकलते थे, तो कई बार कुछ भी लिख पाना संभव नहीं होता था। ऐसी स्थिति में मैं निराश होकर लिखना छोड़ देती थी।
प्रश्न 3.आपने अपनी पुस्तक को व्यक्तिगत संस्मरण बताया है, जिसमें राजनीति केवल पृष्ठभूमि की तरह है। लेकिन इस पुस्तक के केंद्र में राजीव गांधी और आपके प्रेम की कहानी दिखाई देती है। एक प्रेम कहानी, जो धीरे-धीरे आपको गांधी परिवार, भारतीय समाज और अंततः देश की राजनीति के केंद्र तक ले आई। क्या यह किसी फिल्मी कहानी से कम है?
सोनिया गांधी:हां! यही एक कारण था कि इतने लंबे समय तक मैं इस बारे में बात नहीं करना चाहती थी। लेकिन यह केवल हम दोनों की प्रेम कहानी नहीं है। यह उस कहानी का भी हिस्सा है कि कैसे मुझे राजीव के परिवार और उस देश से प्रेम हो गया, जिससे उनका संबंध था और फिर धीरे-धीरे मैं भी उसी देश की हो गई।
यह भी उस प्रेम की कहानी है, जिसने मुझे सार्वजनिक जीवन में आने के लिए प्रेरित किया। जब मैंने देखा कि उनके द्वारा किए गए बलिदानों का उद्देश्य खतरे में पड़ रहा है और कांग्रेस पार्टी कमजोर हो रही है, तो मुझे लगा कि मुझे कुछ करना चाहिए।
प्रश्न 4.आपका जन्म इटली के एक छोटे शहर में हुआ था। वहां का सामाजिक और पारिवारिक वातावरण भारत से बिल्कुल अलग था। भारत में छह दशकों से अधिक समय बिताने के बाद आज आपके व्यक्तित्व में उस युवा इतालवी महिला की कितनी झलक बाकी है?
सोनिया गांधी:बचपन में मैंने जो मूल्य सीखे थे, वे आज भी मेरे भीतर मौजूद हैं। मैंने हमेशा उनके प्रति ईमानदार रहने की कोशिश की है। परिवार और मित्रों के प्रति निष्ठा, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, ईमानदारी, कर्तव्य और जिम्मेदारी की भावना आज भी मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा हैं।
मैं कह सकती हूं कि इन मूल्यों के मामले में मैं आज भी वही व्यक्ति हूं, जिससे राजीव लगभग 60 वर्ष पहले मिले थे। हालांकि, उस समय मैं आज की तुलना में कहीं अधिक मुस्कुराती और हंसती थी।
प्रश्न 5.राजीव गांधी और इंदिरा गांधी आपके जीवन के दो महत्वपूर्ण व्यक्तित्व रहे हैं। उनके व्यक्तित्व की कौन-सी विशेषताएं आपको सबसे अधिक प्रभावित करती थीं और उन्होंने आपके जीवन को किस प्रकार दिशा दी?
सोनिया गांधी:जब मैं एक युवा दुल्हन के रूप में भारत आई थी, तब मुझे भारत के बारे में कुछ भी पता नहीं था। आज मैं जो कुछ भी हूं और जितना कुछ जानती हूं, वह मैंने उन्हीं दोनों से सीखा है।
उनका साहस, संवेदनशीलता, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत के प्रति प्रतिबद्धता और सबसे बढ़कर कर्तव्य को हर चीज से ऊपर रखने की भावना ने मुझे प्रेरित किया। कठिन परिस्थितियों और संदेह के समय में इन्हीं गुणों ने मुझे मजबूती प्रदान की।
प्रश्न 6.आपने अपनी पुस्तक में लिखा है कि आपातकाल के दौरान संजय गांधी का नाम उसके दमनकारी पहलुओं से जुड़ गया था। राजीव गांधी अपनी मां को लोगों की शिकायतों और प्रतिक्रियाओं से अवगत कराते थे, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिलता था। क्या आपको लगता है कि यदि इंदिरा गांधी ने राजीव गांधी और अन्य लोगों की बात सुनी होती, तो आपातकाल की ज्यादतियों को रोका जा सकता था?
सोनिया गांधी:इसके लिए केवल संजय गांधी जिम्मेदार नहीं थे, हालांकि आम लोगों की नजर में आपातकाल का नाम अक्सर उन्हीं से जुड़ा हुआ है। उस समय इंदिरा गांधी पर उनके कुछ वरिष्ठ सहयोगियों का भी काफी दबाव था।
मेरा मानना है कि उनके आसपास राजीव गांधी जैसे बहुत कम लोग थे, जिनका दृष्टिकोण अलग था। अंततः मेरी सास ने अपनी समझ और विवेक से परिस्थितियों को पहचाना और उनमें सुधार के लिए कदम उठाए।
प्रश्न 7.आपातकाल को स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक काला अध्याय माना जाता है। क्या इसे केवल अत्यधिक केंद्रीकृत शासन और कुछ ज्यादतियों का दौर कहने के बजाय अलोकतांत्रिक और अधिनायकवादी दौर के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए?
सोनिया गांधी:आपातकाल के दौरान जो कुछ हो रहा था, उसकी वास्तविक गंभीरता मुझे बाद में समझ में आई। यह सच है कि लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित किया गया था और बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) के अधिकार को निलंबित कर दिया गया था। हालांकि, यह संवैधानिक प्रक्रिया के तहत किया गया था।
लेकिन जब मैं उस समय की परिस्थितियों को श्रीमती गांधी के दृष्टिकोण से देखने की कोशिश करती हूं, तो मुझे लगता है कि वह तेजी से बिगड़ती परिस्थितियों से निपटने के लिए संघर्ष कर रही थीं। उस समय हिंसक विरोध प्रदर्शन हो रहे थे, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक परिवहन को आग लगाई जा रही थी तथा व्यापक स्तर पर अशांति फैली हुई थी। यहां तक कि नौकरशाही और सशस्त्र बलों से सरकारी आदेशों की अवहेलना करने का आह्वान भी किया गया था।
आज पीछे मुड़कर देखने पर हम परिस्थितियों को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि श्रीमती गांधी ने स्वयं परिस्थितियों को समझा और मार्च 1977 में चुनाव कराने का निर्णय लिया। बाद में उन्होंने सार्वजनिक रूप से आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों पर खेद भी व्यक्त किया और माफी मांगी।
प्रश्न 8.आपकी पुस्तक में आरएसएस, भाजपा और संघ परिवार को लेकर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां हैं। आप मानती हैं कि इनसे भारतीय समाज, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक मूल्यों को खतरा पैदा हुआ है। क्या कांग्रेस ने ऐतिहासिक रूप से और हाल के वर्षों में इन मुद्दों पर हिंदुत्व की राजनीति से खुद को स्पष्ट रूप से अलग रखा है?
सोनिया गांधी:बिल्कुल! मैं स्वीकार करती हूं कि पार्टी के भीतर कुछ ऐसे लोग रहे हैं, जो मानते थे कि धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर हमें इतना स्पष्ट और कठोर रुख नहीं अपनाना चाहिए। लेकिन यह पार्टी का दृष्टिकोण नहीं है।
हमारी नीतियों और कार्यों में मैंने हमेशा इस बात का समर्थन किया है कि देश के प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भय के अपने धर्म और विश्वास का पालन करने का संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए।
प्रश्न 9.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में आपने लिखा है कि आप दोनों की विचारधाराएं अलग-अलग हैं और भारत को लेकर दृष्टिकोण भी भिन्न हैं। हालांकि, आपने यह भी स्वीकार किया है कि मोदी ने आरएसएस के भीतर एक वंचित पृष्ठभूमि से अपनी राजनीतिक जगह बनाई। कांग्रेस को इससे क्या राजनीतिक सबक लेना चाहिए?
सोनिया गांधी:यह सच है कि उनकी विचारधारा हमसे बिल्कुल अलग है। लेकिन राजनीति में सफलता प्राप्त करने के कई रास्ते होते हैं। कांग्रेस पार्टी में ही डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे इसके उदाहरण हैं।
मुझे नहीं लगता कि हमें आरएसएस से कुछ सीखने की जरूरत है।
प्रश्न 10.आपने अपनी पुस्तक में शरद पवार, पी.ए. संगमा और तारिक अनवर द्वारा आपके विदेशी मूल का मुद्दा उठाए जाने से हुई पीड़ा का उल्लेख किया है। उस समय आपने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा भी दे दिया था। क्या उस घटना ने भविष्य में प्रधानमंत्री पद स्वीकार न करने के आपके निर्णय को प्रभावित किया?
सोनिया गांधी:निश्चित रूप से मुझे बहुत दुख हुआ था। वे मेरे सहयोगी थे और मुझे उन पर भरोसा था, लेकिन बाद में पता चला कि उन्हें मुझ पर भरोसा नहीं था। यह मेरे लिए एक झटका था कि वे आज भी मुझे बाहरी व्यक्ति के रूप में देखते थे।
पीछे मुड़कर देखने पर मुझे लगता है कि उनके अपने कुछ कारण रहे होंगे। लेकिन उस समय मैं राजनीति में बिल्कुल नई थी और प्रधानमंत्री बनने का विचार मेरे दिमाग में कहीं भी नहीं था।
हां, मैंने इस्तीफा दिया था, लेकिन कुछ समय आत्ममंथन करने के बाद मुझे लगा कि मैं अपनी व्यक्तिगत भावनाओं को अपने बड़े उद्देश्य के रास्ते में नहीं आने दे सकती। मुझे आगे बढ़ना था।
प्रश्न 11.2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन की जीत के बाद लगभग सभी को उम्मीद थी कि आप प्रधानमंत्री बनेंगी। लेकिन आपने अंततः यह पद स्वीकार नहीं किया और डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। क्या आपने कभी सोचा कि यदि आप प्रधानमंत्री बनतीं तो यूपीए सरकार की नीतियां और कांग्रेस की रणनीति किस प्रकार अलग होती?
सोनिया गांधी:नहीं, बिल्कुल नहीं। यह विचार कभी मेरे मन में नहीं आया।
हमारा अनुभव कुल मिलाकर बहुत सकारात्मक रहा। हमने एक टीम के रूप में काम किया और हमारी भूमिकाएं अलग-अलग थीं। सरकार का नेतृत्व डॉ. मनमोहन सिंह कर रहे थे और मैं पार्टी का नेतृत्व कर रही थी।
प्रश्न 12.आपने अपनी पुस्तक में लिखा है कि राजनीतिक जीवन में कई बार ऐसे समझौते करने पड़े, जिनसे आपका मन पूरी तरह सहमत नहीं था। क्या आप बता सकती हैं कि वे समझौते किस प्रकार के थे?
सोनिया गांधी:हमें यथार्थवादी होना चाहिए। राजनीति में कई बार समझौते अपरिहार्य हो जाते हैं। कभी-कभी हमारे सामने ऐसे कठिन राजनीतिक विकल्प आते थे, जब हमें उन लोगों के साथ भी हाथ मिलाना पड़ता था, जो हमारी राजनीतिक विचारधारा से सहमत नहीं थे।
यह बात मुझे कभी सहज नहीं लगी। लेकिन एक बात को लेकर मैं पूरी तरह स्पष्ट हूं कि हमने कभी भाजपा और आरएसएस के साथ कोई समझौता नहीं किया और न ही भविष्य में कभी करेंगे।
प्रश्न 13.आपने संसद और सार्वजनिक जीवन में शालीनता तथा मर्यादा के पतन पर चिंता जताई है। क्या आपको लगता है कि 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा सत्ता से बाहर होती है, तो राजनीति फिर से नीतियों और कार्यक्रमों पर आधारित प्रतिस्पर्धा की ओर लौट सकती है?
सोनिया गांधी:पिछले 12 वर्षों में हमारे देश की सामाजिक संरचना, लोकतंत्र और संस्थाओं को बहुत नुकसान पहुंचा है।
इस सरकार के जाने के बाद भी हमारी संस्थाओं और व्यवस्थाओं को दोबारा स्वस्थ स्थिति में लाने में समय लगेगा। इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को बहुत मेहनत करनी होगी।
लोग अब बेचैन होने लगे हैं और नुकसान को पहचान रहे हैं। लेकिन मैं आशावादी हूं। मुझे विश्वास है कि भारत की जनता सुशासन की वापसी का स्वागत करेगी।
प्रश्न 14.कांग्रेस का भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टी के रूप में कमजोर होना एक राजनीतिक वास्तविकता है। पिछले तीन दशकों में पार्टी हिंदुत्व की राजनीति के विस्तार को रोकने में संघर्ष करती रही है। आप कांग्रेस की वर्तमान स्थिति और उसके भविष्य की संभावनाओं को किस तरह देखती हैं?
सोनिया गांधी:मैं इतनी निराशावादी नहीं हूं।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जब से यह सरकार सत्ता में आई है, तब से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को समान अवसर नहीं मिले हैं। सभी संस्थाओं, विशेष रूप से चुनाव आयोग पर सरकार का पूरा नियंत्रण है। मुख्यधारा का मीडिया, धनबल और धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल भी इसी स्थिति का हिस्सा है।
इसके बावजूद हमारी पार्टी संघर्ष कर रही है और आगे बढ़ रही है। वास्तव में कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है, जिसने इस हमले का सामना करने की क्षमता दिखाई है।
हमारे कार्यकर्ताओं और नेताओं ने असाधारण साहस दिखाया है। उन्होंने हर तरह के उत्पीड़न का सामना किया है। इसके बावजूद गांव-गांव और जिले-जिले में कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता संविधान में निहित मूल्यों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
हाल के महीनों में यह बात भी सामने आई है कि कई चुनावों में धांधली हुई है और अब लोग इसके प्रति अधिक जागरूक हो रहे हैं।
कांग्रेस समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर काम कर रही है और हमारी राजनीतिक संभावनाएं दिन-प्रतिदिन बेहतर हो रही हैं।
प्रश्न 15.आपकी पुस्तक Belonging: A Journey of Love के प्रकाशक को लॉन्च से कुछ महीने पहले बदल दिया गया। पहले पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया इसे प्रकाशित करने वाला था, लेकिन बाद में हार्पर कॉलिन्स इंडिया ने 10 नवंबर को इसके प्रकाशन की घोषणा की।
इस बदलाव के पीछे नरेंद्र मोदी, आरएसएस, सांप्रदायिक तनाव, अल्पसंख्यकों और चीन के साथ भारत के संबंधों जैसे विषयों पर मतभेद की खबरें सामने आईं। क्या वास्तव में पुस्तक की सामग्री को लेकर प्रकाशक के साथ विवाद हुआ था या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा बड़ा मुद्दा था?
सोनिया गांधी:मैं इन विवादों में खुद को शामिल करना पसंद नहीं करूंगी।
7th November, 2026
