आजाद भारत के इतिहास में निर्वाचन आयोग को लेकर उच्चतम न्यायालय के सामने ऐसा प्रकरण आया है, जिसमें लोकतंत्र को कलंकित करने, मतदाताओं का मताधिकार प्रभावित करने और एक दल विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए कानूनों में फेरबदल करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों को लेकर दायर याचिकाओं पर सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई की। पीठ ने निर्वाचन आयोग, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी सहित संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
उच्चतम न्यायालय की इस कार्रवाई के बावजूद जनता में अभी पूरा भरोसा कायम नहीं हो पा रहा है। इसके पीछे पूर्व में सामने आए ऐसे कई मामले हैं, जिनमें उच्चतम न्यायालय ने शुरुआत में तेजी दिखाई और जनता के बीच न्याय की उम्मीद पैदा हुई, लेकिन लंबे समय तक अंतिम निर्णय नहीं आया। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में विधायकों की सदस्यता से जुड़े मामले का उल्लेख किया जा सकता है, राज्य में दोबारा विधानसभा चुनाव हुए और भाजपा सत्भीता में है।
हालांकि, निर्वाचन आयोग से जुड़ा वर्तमान मामला कई मायनों में अलग और अत्यंत संवेदनशील है। याचिकाओं में मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने, SIR के नियमों और प्रक्रिया में बदलाव, मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा निर्वाचन आयुक्तों को कानूनी संरक्षण देने वाले प्रावधानों और मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इन दावों की स्वतंत्र रूप से न्यायिक जांच और कानूनी परीक्षण होना अभी बाकी है।
इसी बीच, निर्वाचन आयोग के दो आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशीद्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कुछ निर्णयों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति जताए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार SIR से संबंधित निर्णयों और आदेशों पर आपत्तियां दर्ज की थीं।
इन घटनाक्रमों के साथ मतदाताओं, विभिन्न राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों और विपक्षी दलों के नेताओं की ओर से भी निर्वाचन प्रक्रिया, मतदाता सूची और मतगणना को लेकर सवाल उठाए गए हैं। इन सभी दावों और आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही हो सकता है। मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि निर्वाचन आयोग भारतीय लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया की संवैधानिक संस्था है। उसके निर्णयों और कार्यप्रणाली पर उठने वाले सवाल केवल किसी एक राजनीतिक दल या चुनाव तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनका प्रभाव लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास पर पड़ता है।
ऐसे में उच्चतम न्यायालय के सामने चुनौती केवल किसी एक याचिका पर निर्णय देने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े आरोपों और संवैधानिक सवालों का परीक्षण पारदर्शी, निष्पक्ष और विधिक कसौटियों पर हो। न्यायालय ने जिस गंभीरता के साथ प्रारंभिक सुनवाई की है, उससे मामले के व्यापक संवैधानिक महत्व का संकेत मिलता है।
हालांकि, पूर्व के कुछ मामलों में अंतिम निर्णय में हुई देरी को देखते हुए संशय अभी बरकरार है। इसलिए इस मामले में उच्चतम न्यायालय का अंतिम निर्णय विशेष महत्व रखता है। लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने के लिए जरूरी है कि निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े आरोपों और शिकायतों का निपटारा स्पष्ट विधिक आधार, पारदर्शिता और समयबद्ध प्रक्रिया के माध्यम से हो। इससे न केवल संस्थाओं की विश्वसनीयता मजबूत होगी, बल्कि मतदाताओं के अधिकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के विश्वास की भी रक्षा होगी।
उच्चतम न्यायालय की इस कार्रवाई के बावजूद जनता में अभी पूरा भरोसा कायम नहीं हो पा रहा है। इसके पीछे पूर्व में सामने आए ऐसे कई मामले हैं, जिनमें उच्चतम न्यायालय ने शुरुआत में तेजी दिखाई और जनता के बीच न्याय की उम्मीद पैदा हुई, लेकिन लंबे समय तक अंतिम निर्णय नहीं आया। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में विधायकों की सदस्यता से जुड़े मामले का उल्लेख किया जा सकता है, राज्य में दोबारा विधानसभा चुनाव हुए और भाजपा सत्भीता में है।
हालांकि, निर्वाचन आयोग से जुड़ा वर्तमान मामला कई मायनों में अलग और अत्यंत संवेदनशील है। याचिकाओं में मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने, SIR के नियमों और प्रक्रिया में बदलाव, मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा निर्वाचन आयुक्तों को कानूनी संरक्षण देने वाले प्रावधानों और मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इन दावों की स्वतंत्र रूप से न्यायिक जांच और कानूनी परीक्षण होना अभी बाकी है।
इसी बीच, निर्वाचन आयोग के दो आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशीद्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कुछ निर्णयों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति जताए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार SIR से संबंधित निर्णयों और आदेशों पर आपत्तियां दर्ज की थीं।
इन घटनाक्रमों के साथ मतदाताओं, विभिन्न राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों और विपक्षी दलों के नेताओं की ओर से भी निर्वाचन प्रक्रिया, मतदाता सूची और मतगणना को लेकर सवाल उठाए गए हैं। इन सभी दावों और आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही हो सकता है। मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि निर्वाचन आयोग भारतीय लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया की संवैधानिक संस्था है। उसके निर्णयों और कार्यप्रणाली पर उठने वाले सवाल केवल किसी एक राजनीतिक दल या चुनाव तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनका प्रभाव लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास पर पड़ता है।
ऐसे में उच्चतम न्यायालय के सामने चुनौती केवल किसी एक याचिका पर निर्णय देने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े आरोपों और संवैधानिक सवालों का परीक्षण पारदर्शी, निष्पक्ष और विधिक कसौटियों पर हो। न्यायालय ने जिस गंभीरता के साथ प्रारंभिक सुनवाई की है, उससे मामले के व्यापक संवैधानिक महत्व का संकेत मिलता है।
हालांकि, पूर्व के कुछ मामलों में अंतिम निर्णय में हुई देरी को देखते हुए संशय अभी बरकरार है। इसलिए इस मामले में उच्चतम न्यायालय का अंतिम निर्णय विशेष महत्व रखता है। लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने के लिए जरूरी है कि निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े आरोपों और शिकायतों का निपटारा स्पष्ट विधिक आधार, पारदर्शिता और समयबद्ध प्रक्रिया के माध्यम से हो। इससे न केवल संस्थाओं की विश्वसनीयता मजबूत होगी, बल्कि मतदाताओं के अधिकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के विश्वास की भी रक्षा होगी।
5th October, 2026
