यूरीड मीडिया- अमेरिका में दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प भारत पर लगातार गलत बयानबाजी कर रहे हैं और 140 करोड़ जनता को अपमानित कर रहे हैं। पाकिस्तान और भारत के बीच हुए ऑपरेशन सिंदूर को लेकर ट्रम्प ने 50 बार से अधिक "युद्ध रुकवाया" जैसी बात कहकर देश को अपमानित किया है। ट्रेड डील पर जो बयान लगातार अमेरिका से आ रहे हैं और जो डील का खाका सामने आया है, उसमें ट्रम्प जैसा चाह रहे थे, वही होता दिखाई दे रहा है। एकतरफा ट्रेड डील की घोषणा, 500 अरब डॉलर मूल्य का अमेरिकी माल का आयात भारत को करना पड़ेगा—यह भी घोषणा ट्रम्प ने कर दी। हर मौके पर, हर मुद्दे पर जहाँ भारत का नाम जुड़ता है, ट्रम्प ऐसी बयानबाजी करते हैं, जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जैसा चाहेंगे, वैसा करा लेंगे।
दुनिया में घटनाक्रम भी ऐसे घटित हो रहे हैं, जैसे एपस्टीन फाइल्स का मामला हो—उसमें भारतीय नेताओं और उद्योगपतियों का नाम यौन अपराधी एपस्टीन से जुड़ना और ईमेल से हो रहे खुलासे हैं। इससे दुनिया में भारत की बदनामी हो रही है और एक ऐसा परसेप्शन बन गया है कि भारत का नेतृत्व ट्रम्प से डरता है और ट्रम्प जैसा चाहता है, वही हो रहा है। क्योंकि ट्रम्प का जवाब मौन नहीं है। उसका उसी की तरह सभ्य लहजे में कड़ाई से जवाब देना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भारत का नेतृत्व जवाब नहीं दे पा रहा है। डील को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, उस पर भारत सरकार का बयान संतोषजनक नहीं है।
क्योंकि ट्रम्प के पहले भारत अमेरिकी उत्पादों पर औसत 12% टैरिफ लगाता था और अमेरिका भारत के उत्पादों पर 2-3% टैरिफ लगाता था, जो तनावपूर्ण विवादों के बाद 50% तक पहुंच गया। ट्रम्प ने उसे घटाकर 18% कर दिया और भारत ने अमेरिकी सभी उत्पादों पर टैरिफ जीरो कर दिया। अर्थशास्त्री को छोड़ दें तो सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति भी यह गुणा-भाग कर लेगा कि 18% टैरिफ और 0% टैरिफ में भारी कौन है। निश्चित रूप से अमेरिका बहुत भारी पड़ रहा है।
अमेरिकी ट्रेड डील से देश के 140 करोड़ उपभोक्ता ट्रम्प के भेजे गए सस्ते माल पर वैसे ही आश्रित हो जाएंगे, जैसे आज चीन के प्रोडक्ट्स पर आश्रित हो गए हैं। जिस तरह से अमेरिका में किसानों को सब्सिडी दी जा रही है, उसकी तुलना में भारत का किसान कहीं ठहरा नहीं है। ट्रेड डील में कौन से उत्पाद शामिल किए हैं, कौन नहीं—इसे लेकर भी असमंजस बना हुआ है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल सही और स्पष्ट रूप से शंकाओं का समाधान नहीं कर पाए हैं। कृषि उत्पादों को लेकर जो भी आयात अमेरिका से होगा, निश्चित रूप से भारत के महंगे प्रोडक्ट्स पर भारी पड़ेगा।
दूसरा, ट्रम्प लगातार भारत को रूस से तेल न लेने की धमकी दे रहे हैं और कह रहे हैं कि डील के बाद भी अगर भारत ने रूस से तेल खरीदा तो टैरिफ फिर 50% कर देंगे। ऐसे तमाम सवाल हैं जो यह बता रहे हैं कि ट्रम्प से भारत का नेतृत्व दबाव में है और 140 करोड़ जनता अपमानित हो रही है। ट्रम्प के बयानों से ऐसा परसेप्शन बन गया है कि भारत में अमेरिका जो चाह रहा है, वही हो रहा है—क्योंकि भारतीय नेतृत्व दबाव में है।
विपक्ष भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी से लेकर क्षेत्रीय दलों के नेता सभी मोदी और भाजपा पर अपने-अपने तरीके से विरोध एवं हमला कर रहे हैं। वास्तविक रूप से संगठित होकर अमेरिका के दबाव को कम करने के लिए मोदी पर न तो दबाव बना पा रहे हैं और न ही एक साथ जुटकर ट्रम्प को देशहित में कड़ा जवाब दे पा रहे हैं। बढ़ी हुई दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बन गई है कि गांव, गरीब, किसान और देश की चिंता नहीं—व्यक्तिगत सियासी प्रतिशोध में पक्ष और विपक्ष उलझा हुआ है।
दुनिया में घटनाक्रम भी ऐसे घटित हो रहे हैं, जैसे एपस्टीन फाइल्स का मामला हो—उसमें भारतीय नेताओं और उद्योगपतियों का नाम यौन अपराधी एपस्टीन से जुड़ना और ईमेल से हो रहे खुलासे हैं। इससे दुनिया में भारत की बदनामी हो रही है और एक ऐसा परसेप्शन बन गया है कि भारत का नेतृत्व ट्रम्प से डरता है और ट्रम्प जैसा चाहता है, वही हो रहा है। क्योंकि ट्रम्प का जवाब मौन नहीं है। उसका उसी की तरह सभ्य लहजे में कड़ाई से जवाब देना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भारत का नेतृत्व जवाब नहीं दे पा रहा है। डील को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, उस पर भारत सरकार का बयान संतोषजनक नहीं है।
क्योंकि ट्रम्प के पहले भारत अमेरिकी उत्पादों पर औसत 12% टैरिफ लगाता था और अमेरिका भारत के उत्पादों पर 2-3% टैरिफ लगाता था, जो तनावपूर्ण विवादों के बाद 50% तक पहुंच गया। ट्रम्प ने उसे घटाकर 18% कर दिया और भारत ने अमेरिकी सभी उत्पादों पर टैरिफ जीरो कर दिया। अर्थशास्त्री को छोड़ दें तो सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति भी यह गुणा-भाग कर लेगा कि 18% टैरिफ और 0% टैरिफ में भारी कौन है। निश्चित रूप से अमेरिका बहुत भारी पड़ रहा है।
अमेरिकी ट्रेड डील से देश के 140 करोड़ उपभोक्ता ट्रम्प के भेजे गए सस्ते माल पर वैसे ही आश्रित हो जाएंगे, जैसे आज चीन के प्रोडक्ट्स पर आश्रित हो गए हैं। जिस तरह से अमेरिका में किसानों को सब्सिडी दी जा रही है, उसकी तुलना में भारत का किसान कहीं ठहरा नहीं है। ट्रेड डील में कौन से उत्पाद शामिल किए हैं, कौन नहीं—इसे लेकर भी असमंजस बना हुआ है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल सही और स्पष्ट रूप से शंकाओं का समाधान नहीं कर पाए हैं। कृषि उत्पादों को लेकर जो भी आयात अमेरिका से होगा, निश्चित रूप से भारत के महंगे प्रोडक्ट्स पर भारी पड़ेगा।
दूसरा, ट्रम्प लगातार भारत को रूस से तेल न लेने की धमकी दे रहे हैं और कह रहे हैं कि डील के बाद भी अगर भारत ने रूस से तेल खरीदा तो टैरिफ फिर 50% कर देंगे। ऐसे तमाम सवाल हैं जो यह बता रहे हैं कि ट्रम्प से भारत का नेतृत्व दबाव में है और 140 करोड़ जनता अपमानित हो रही है। ट्रम्प के बयानों से ऐसा परसेप्शन बन गया है कि भारत में अमेरिका जो चाह रहा है, वही हो रहा है—क्योंकि भारतीय नेतृत्व दबाव में है।
विपक्ष भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी से लेकर क्षेत्रीय दलों के नेता सभी मोदी और भाजपा पर अपने-अपने तरीके से विरोध एवं हमला कर रहे हैं। वास्तविक रूप से संगठित होकर अमेरिका के दबाव को कम करने के लिए मोदी पर न तो दबाव बना पा रहे हैं और न ही एक साथ जुटकर ट्रम्प को देशहित में कड़ा जवाब दे पा रहे हैं। बढ़ी हुई दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बन गई है कि गांव, गरीब, किसान और देश की चिंता नहीं—व्यक्तिगत सियासी प्रतिशोध में पक्ष और विपक्ष उलझा हुआ है।
7th February, 2026
