दुनिया में कई ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने अपने कार्यों और सिद्धांतों से न केवल हम पर गहरी छाप छोड़ी, बल्कि दूसरों को भी प्रेरित किया। भारत के “पद्मश्री” से सम्मानित डॉ. तपन कुमार लाहिरी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिनकी दृढ़ता और समर्पण ने सभी को नतमस्तक होने पर मजबूर कर दिया।
डॉ. लाहिरी का जन्म कोलकाता में हुआ। उन्होंने 1970 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका से चिकित्सा की पढ़ाई की और भारत लौटकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में मात्र 250 रुपये मासिक वेतन पर लेक्चरर के रूप में कार्य किया। उन्होंने जरूरतमंद मरीजों की सेवा के लिए विवाह नहीं किया।
डॉ. तपन कुमार लाहिरी उत्तर प्रदेश के एक कार्डियोथोरेसिक सर्जन, चिकित्सा शिक्षाविद और लेखक हैं। वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के कार्डियोथोरेसिक सर्जरी विभाग में प्रोफेसर रह चुके हैं। भारत सरकार ने चिकित्सा क्षेत्र में उनके योगदान के लिए वर्ष 2016 में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान “पद्मश्री” से सम्मानित किया। उन्हें यह सम्मान गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी द्वारा प्रदान किया गया।
बीएचयू के डॉ. लकोटिया ने कहा, “ऐसे व्यक्ति हम सभी के लिए आदर्श होते हैं। उनके जैसे अनुभव सभी के लिए मार्गदर्शक हैं। वे हर पल मरीजों के लिए भोजन दान करते हैं। उनका मानना है कि कर्म ने उन्हें डॉक्टर बनाया ताकि वे हर जरूरतमंद मरीज की मदद कर सकें।”
हालाँकि उन्होंने अपना करियर उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित बीएचयू से शुरू किया, लेकिन आज वे उस शहर में भगवान के समान पूजे जाते हैं। समाज के प्रति आजीवन चिकित्सा सेवा के कारण उन्होंने अपार सम्मान और प्रतिष्ठा अर्जित की। पद्मश्री सम्मान प्राप्त करने के बाद डॉ. लाहिरी ने कहा, “भगवान विश्वनाथ और माँ अन्नपूर्णा की कृपा से मैं अंतिम सांस तक मरीजों की सेवा करता रहूँगा। इस सम्मान के लिए मैं सरकार का आभारी हूँ।”
डॉ. लाहिरी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके आवास पर मिलने से इनकार कर दिया। वे वाराणसी के उन प्रमुख लोगों में से थे जिनसे मुख्यमंत्री मिलना चाहते थे। डॉ. लाहिरी ने अधिकारियों से कहा, “अगर मुख्यमंत्री मुझसे मिलना चाहते हैं, तो उनसे कहिए कि वे मेरे ओपीडी में आकर मिलें।”
इसके बाद मुख्यमंत्री के साथ बैठक स्थगित कर दी गई। कहा जाता है कि यदि मुख्यमंत्री चाहते, तो वे ओपीडी में डॉ. लाहिरी से मिल सकते थे, लेकिन वीवीआईपी आगमन से मरीजों को असुविधा हो सकती थी। इससे पहले भी खबर आई थी कि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिंह से मिलने के लिए भी ऐसा ही जवाब दिया था।
सेवानिवृत्ति से पहले उनका मूल वेतन 84,000 रुपये था और भत्तों सहित यह 1,00,000 रुपये से अधिक हो जाता था। वे 1994 से अपनी पूरी तनख्वाह गरीबों को दान करते आ रहे हैं। अब सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें पेंशन मिलती है, लेकिन वे उतनी ही राशि अपने लिए रखते हैं जिससे दिन में दो बार भोजन कर सकें। शेष पेंशन वे बीएचयू को दान कर देते हैं ताकि गरीब मरीजों को लाभ मिल सके।
वे आज भी बीएचयू में निःशुल्क चिकित्सा सेवाएँ दे रहे हैं। डॉ. लाहिरी को आज भी एक हाथ में बैग और दूसरे हाथ में काली छतरी लिए घर या बीएचयू अस्पताल की ओर पैदल जाते हुए देखा जा सकता है। भारत जैसे देश में वे उन गिने-चुने डॉक्टरों में से हैं जो मरीजों का इलाज बिल्कुल मुफ्त करते हैं। वाराणसी के लोग उन्हें भगवान मानते हैं। वे पंडित मदन मोहन मालवीय के उस स्वप्न को आज भी साकार कर रहे हैं, जिसके तहत बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी—जो एशिया का सबसे बड़ा आवासीय विश्वविद्यालय और विश्व के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में से एक है।
आज के दौर में हम देखते हैं कि कई डॉक्टर मरीजों को लूटते हैं। अधिकांश डॉक्टर विलासितापूर्ण जीवन जीते हैं, महंगी गाड़ियाँ चलाते हैं और दवा कंपनियों व पैथोलॉजी केंद्रों से कमीशन लेते हैं। यहाँ तक कि सरकारी अस्पतालों के कुछ डॉक्टर भी ऐसी दवाएँ लिखते हैं जो केवल अस्पताल के पास की चुनिंदा दुकानों पर ही मिलती हैं। यह डॉक्टरों और मेडिकल दुकानों के बीच कमीशन का स्पष्ट उदाहरण है। दुर्भाग्य से, आज कई डॉक्टर व्यवसायी बन चुके हैं और कभी-कभी शवों को भी वेंटिलेटर पर रखकर बिल बनाने से नहीं चूकते। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, तीन दशकों में हजारों डॉक्टरों को प्रशिक्षित करने वाले डॉ. लाहिरी के पास आज भी अपनी कोई चारपहिया गाड़ी नहीं है।
जितनी निष्ठा उनके पेशे में है, उतनी ही उनकी समयपालन में भी। आज लगभग 85 वर्ष की आयु में भी बीएचयू के लोग अपनी घड़ियाँ उनके आने-जाने के समय से मिलाते हैं। वे प्रतिदिन एक निश्चित समय पर विश्वविद्यालय पहुँचते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद बीएचयू ने उन्हें एमेरिटस प्रोफेसर का दर्जा दिया।
वे प्रतिदिन सुबह 6 बजे बीएचयू पहुँचते हैं और लगभग तीन घंटे काम करने के बाद घर लौटते हैं। इसी तरह वे शाम को भी अपनी सेवाएँ देते हैं। वे आज भी अपने घर से अस्पताल तक पैदल जाते हैं। इसके बदले वे बीएचयू से आवास के अलावा कोई लाभ नहीं लेते।
लाखों गरीब मरीजों के दिल आज भी धड़क रहे हैं, जिन्हें पैसे के अभाव में महंगा इलाज नहीं मिल पाता। गंभीर हृदय रोगों से पीड़ित अनेक गरीब मरीज मृत्यु के मुख में जा रहे थे, लेकिन डॉ. लाहिरी ने फरिश्ता बनकर उनकी जान बचाई।
12th January, 2026
