राजेन्द्र द्विवेदी, यूरीड मीडिया- भाजपा सरकार ने एक देश एक चुनाव को देशहित में बताते हुए आयोग का गठन किया है और आने वाले समय में इसे लागू करने का प्रयास भी होगा, जबकि एक देश एक चुनाव लागू करने में बहुत सी तकनीकी, संवैधानिक एवं व्यावहारिक कठिनाइयाँ हैं। लेकिन इसे लागू करने के लिए सरकार निर्णय कर चुकी है। जबकि एक मतदाता सूची में किसी प्रकार की तकनीकी, संवैधानिक व व्यावहारिक कठिनाई नहीं है, तो इसे लागू क्यों नहीं किया गया? अगर एक मतदाता सूची पर सभी चुनाव होते, तो अभी तक अरबों रुपये की बचत होती। शिक्षण कार्य और अन्य विकास कार्यों में लगे कर्मचारी बार-बार बीएलओ नहीं बनाए जाते, शिक्षण कार्य प्रभावित नहीं होता। लोकसभा, विधानसभा और शहरी निकायों के चुनाव में मतदाता सूचियों में विसंगतियाँ भी नहीं होतीं।
देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव भारत निर्वाचन आयोग कराता है और पंचायत एवं शहरी निकाय चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग कराता है। दोनों संवैधानिक संस्थाएँ हैं। दोनों संवैधानिक संस्थाएँ एक साथ मिलकर एक मतदाता सूची पर चुनाव क्यों नहीं करा सकतीं? जबकि अलग-अलग मतदाता सूची बनाने में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और समय बर्बाद होता है। दोनों मतदाता सूचियों को बनाने के लिए जो कर्मचारी बीएलओ बनते हैं, वे कॉमन होते हैं। फिर सवाल यही उठता है कि विशेष मतदाता पुनरीक्षण अभियान के तहत कुल मतदाता संख्या और ग्राम पंचायतों के लिए बनाई गई मतदाता संख्या में भारी विसंगतियाँ क्यों हैं। 6 जनवरी को प्रकाशित SIR में 12 करोड़ 55 लाख 56 हजार मतदाता हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत चुनाव के लिए जो मतदाता सूची तैयार की गई है, उसकी कुल मतदाता संख्या 12 करोड़ 69 लाख है। SIR पूरे प्रदेश का है, जिसमें शहरी और ग्रामीण दोनों मतदाता शामिल हैं, जबकि पंचायतों के लिए तैयार मतदाता सूची में केवल ग्रामीण मतदाता शामिल हैं। अब अगर हम राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार की गई वर्ष 2026 की मतदाता सूची, जिसमें 12 करोड़ 69 लाख मतदाता हैं, और इससे पहले 2023 में शहरी क्षेत्रों में हुए चुनावों की मतदाता संख्या 4 करोड़ 32 लाख को जोड़ दें, तो यह संख्या 16 करोड़ 97 लाख हो जाती है। तो आखिर सही कौन है—SIR कराने वाला निर्वाचन आयोग या राज्य निर्वाचन आयोग? आखिर 4 करोड़ से अधिक मतदाताओं का अंतर कैसे हो सकता है?
यहाँ सबसे गंभीर और महत्वपूर्ण सवाल यही है कि जब SIR हो रहा है, तो उसी मतदाता सूची पर पंचायत चुनाव क्यों नहीं कराया जा रहा है? देखा यह गया है कि लोकसभा, विधानसभा, पंचायतों और निकायों—सभी चुनावों में मतदाता सूचियों में काफी गड़बड़ी पाई जाती है। लाखों मतदाता ऐसे होते हैं जो लोकसभा में मतदान करते हैं, विधानसभा में उनका नाम कट जाता है; विधानसभा में वोट करते हैं, पंचायत में कट जाता है—और यह लगातार हो रहा है। इसके लिए कांग्रेस, भाजपा या अन्य किसी भी सरकार ने ठोस प्रयास नहीं किया। एक मतदाता सूची के मामले में सभी दल फिसड्डी साबित हुए हैं। नौकरशाही को अलग-अलग मतदाता सूची तैयार करने के नाम पर करोड़ों रुपये लूटने का अवसर मिलता है। इसलिए कभी भी एक चुनाव, एक मतदाता सूची में उनकी रुचि नहीं रहती। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि मतदाता सूची की विसंगतियाँ दूर करनी हैं, तो एक मतदाता सूची बनाकर उसी पर सभी चुनाव कराए जाएँ। वर्तमान में SIR को लेकर आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं, लेकिन इस विषय पर राजनीतिक दल एक साथ होकर आम सहमति क्यों नहीं बनाते?
देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव भारत निर्वाचन आयोग कराता है और पंचायत एवं शहरी निकाय चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग कराता है। दोनों संवैधानिक संस्थाएँ हैं। दोनों संवैधानिक संस्थाएँ एक साथ मिलकर एक मतदाता सूची पर चुनाव क्यों नहीं करा सकतीं? जबकि अलग-अलग मतदाता सूची बनाने में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और समय बर्बाद होता है। दोनों मतदाता सूचियों को बनाने के लिए जो कर्मचारी बीएलओ बनते हैं, वे कॉमन होते हैं। फिर सवाल यही उठता है कि विशेष मतदाता पुनरीक्षण अभियान के तहत कुल मतदाता संख्या और ग्राम पंचायतों के लिए बनाई गई मतदाता संख्या में भारी विसंगतियाँ क्यों हैं। 6 जनवरी को प्रकाशित SIR में 12 करोड़ 55 लाख 56 हजार मतदाता हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत चुनाव के लिए जो मतदाता सूची तैयार की गई है, उसकी कुल मतदाता संख्या 12 करोड़ 69 लाख है। SIR पूरे प्रदेश का है, जिसमें शहरी और ग्रामीण दोनों मतदाता शामिल हैं, जबकि पंचायतों के लिए तैयार मतदाता सूची में केवल ग्रामीण मतदाता शामिल हैं। अब अगर हम राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार की गई वर्ष 2026 की मतदाता सूची, जिसमें 12 करोड़ 69 लाख मतदाता हैं, और इससे पहले 2023 में शहरी क्षेत्रों में हुए चुनावों की मतदाता संख्या 4 करोड़ 32 लाख को जोड़ दें, तो यह संख्या 16 करोड़ 97 लाख हो जाती है। तो आखिर सही कौन है—SIR कराने वाला निर्वाचन आयोग या राज्य निर्वाचन आयोग? आखिर 4 करोड़ से अधिक मतदाताओं का अंतर कैसे हो सकता है?
यहाँ सबसे गंभीर और महत्वपूर्ण सवाल यही है कि जब SIR हो रहा है, तो उसी मतदाता सूची पर पंचायत चुनाव क्यों नहीं कराया जा रहा है? देखा यह गया है कि लोकसभा, विधानसभा, पंचायतों और निकायों—सभी चुनावों में मतदाता सूचियों में काफी गड़बड़ी पाई जाती है। लाखों मतदाता ऐसे होते हैं जो लोकसभा में मतदान करते हैं, विधानसभा में उनका नाम कट जाता है; विधानसभा में वोट करते हैं, पंचायत में कट जाता है—और यह लगातार हो रहा है। इसके लिए कांग्रेस, भाजपा या अन्य किसी भी सरकार ने ठोस प्रयास नहीं किया। एक मतदाता सूची के मामले में सभी दल फिसड्डी साबित हुए हैं। नौकरशाही को अलग-अलग मतदाता सूची तैयार करने के नाम पर करोड़ों रुपये लूटने का अवसर मिलता है। इसलिए कभी भी एक चुनाव, एक मतदाता सूची में उनकी रुचि नहीं रहती। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि मतदाता सूची की विसंगतियाँ दूर करनी हैं, तो एक मतदाता सूची बनाकर उसी पर सभी चुनाव कराए जाएँ। वर्तमान में SIR को लेकर आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं, लेकिन इस विषय पर राजनीतिक दल एक साथ होकर आम सहमति क्यों नहीं बनाते?
10th January, 2026
