आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस चीन को भारत अपना सबसे बड़ा सामरिक प्रतिद्वंद्वी मानता है, उसे हम आर्थिक रूप से इतना मजबूत होने में किस तरह मदद पहुंचा रहे हैं? आखिर क्या कारण है कि भारत की अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ-साथ चीन पर हमारी निर्भरता भी बढ़ती गई? और क्या यह स्थिति पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की स्वावलंबी राष्ट्र बनाने की परिकल्पना के विपरीत नहीं है?
यदि हम अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल की तुलना करें, तो चीन के साथ व्यापारिक संबंधों और व्यापार घाटे का सवाल गंभीर रूप से सामने आता है। अटल बिहारी वाजपेयी लगभग छह वर्ष प्रधानमंत्री रहे। उनके कार्यकाल में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगभग 1 बिलियन डॉलर अपेक्षाकृत कम था। इसके बाद मनमोहन सिंह के दस वर्षों के प्रधानमंत्रित्व काल में यह बढ़कर 50 गुना हो गया और नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में बढ़कर 100 गुना हो गया।
यहां सवाल केवल व्यापार घाटे का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या हम अपने सबसे बड़े सामरिक प्रतिद्वंद्वी को आर्थिक रूप से मजबूत करते हुए अपनी ही सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को बढ़ा रहे हैं?
सीमा पर चीन की रणनीति और भारत के सामने नई चुनौती
चीन की सैन्य तैयारियों और सीमा पर उसकी गतिविधियों को लेकर समय-समय पर गंभीर चिंताएं सामने आती रही हैं। भारत-चीन सीमा पर विवाद केवल दो देशों के बीच जमीन के किसी टुकड़े का विवाद नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सामरिक तैयारी और आर्थिक शक्ति से भी जुड़ा हुआ विषय है।
हाल के दिनों में अरुणाचल प्रदेश की सीमा से जुड़ी गतिविधियों और चीन की आधुनिक सैन्य तैयारियों को लेकर चिंता व्यक्त की गई है। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर के सामने आए बयान में भी आधुनिक तकनीक, ड्रोन और ड्रोन-रोधी क्षमताओं की आवश्यकता पर जोर दिए जाने की बात कही गई है। इस तरह की चिंताएं हमें यह सोचने के लिए विवश करती हैं कि बदलती सैन्य परिस्थितियों के अनुरूप भारत अपनी तैयारियों को कितना मजबूत कर रहा है।
आधुनिक युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं लड़े जाते। ड्रोन, निगरानी प्रणालियां, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता, संचार तकनीक और आधुनिक रक्षा उपकरणों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए भारत को भी अपनी रक्षा तैयारियों में इन क्षेत्रों पर पर्याप्त निवेश करना होगा।
लेकिन इसके साथ एक दूसरा सवाल भी है। यदि चीन लगातार अपनी सैन्य और तकनीकी क्षमताओं को बढ़ा रहा है, तो उसकी आर्थिक शक्ति का स्रोत क्या है? उसकी विनिर्माण क्षमता, निर्यात और वैश्विक व्यापार में बढ़ती हिस्सेदारी उसे संसाधन उपलब्ध कराती है। ऐसे में भारत को अपनी आर्थिक और औद्योगिक क्षमता मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि वह सामरिक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके।
1962 से सलामी स्लाइसिंग तक: चीन की रणनीति में बदलाव
भारत और चीन के संबंधों का इतिहास कई गंभीर घटनाओं से भरा हुआ है। वर्ष 1962 में चीन के साथ युद्ध ने भारत की सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को उजागर कर दिया था। उस समय हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा भी दोनों देशों के बीच युद्ध को रोक नहीं सका। चीन के साथ सीमा विवाद और उसके द्वारा भारतीय क्षेत्र पर कब्जे के आरोप लंबे समय से भारत की सामरिक चिंताओं का हिस्सा रहे हैं।
समय के साथ चीन ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। वह केवल प्रत्यक्ष युद्ध की स्थिति पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में धीरे-धीरे दबाव बनाने, बुनियादी ढांचे का विस्तार करने और अपनी उपस्थिति मजबूत करने की रणनीति भी अपनाता है। इस रणनीति को आम तौर पर सलामी स्लाइसिंग कहा जाता है।
सलामी स्लाइसिंग का अर्थ है किसी बड़े क्षेत्र पर एक साथ कब्जा करने के बजाय छोटे-छोटे कदमों के माध्यम से धीरे-धीरे अपनी स्थिति मजबूत करना और प्रतिद्वंद्वी के सामने नई परिस्थितियां पैदा करना। भारत-चीन सीमा पर होने वाली कुछ गतिविधियों को इसी दृष्टिकोण से देखा जाता है।
चीन और भारत के बीच 1967 में नाथू ला और चो ला में संघर्ष हुआ। 1975 में अरुणाचल प्रदेश के तुलुंग ला क्षेत्र में भारतीय सैनिकों की हत्या की घटना सामने आई। 1986-87 में सुमदोरोंग चू को लेकर तनाव बढ़ा। वर्ष 2013 में दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में गतिरोध हुआ, जबकि 2014 में चुमार क्षेत्र में भी विवाद सामने आया।
वर्ष 2017 में डोकलाम में भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने आ गईं। इसके बाद 2020 में गलवान घाटी में हिंसक झड़प हुई, जिसमें भारत के 20 सैनिक शहीद हुए। इस संघर्ष में चीनी पक्ष को भी हताहतों का सामना करना पड़ा। बाद के वर्षों में भी सीमा पर तनाव और सैन्य गतिरोध की स्थितियां बनी रहीं।
इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि चीन के साथ सीमा विवाद कोई नई समस्या नहीं है। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी सीमा की सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक, तकनीकी और औद्योगिक क्षमताओं को भी मजबूत करे।
अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में व्यापार घाटा
अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल की तुलना में मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा तेजी से बढ़ा। नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भी यह वृद्धि जारी रही। इस स्थिति को केवल किसी एक प्रधानमंत्री की नीतियों से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि इसमें वैश्विक व्यापार, घरेलू उत्पादन, औद्योगिक नीतियों, आयात की मांग और चीन की विनिर्माण क्षमता जैसे अनेक कारकों की भूमिका है।
फिर भी, यह सवाल अपनी जगह कायम है कि भारत ने चीन से आयात पर बढ़ती निर्भरता को कम करने के लिए पर्याप्त कदम क्यों नहीं उठाए? क्या हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए घरेलू उद्योगों को पर्याप्त प्रोत्साहन दे पाए? और क्या हमारी आर्थिक नीतियां देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अपेक्षित परिणाम दे सकी हैं?
इन प्रश्नों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। चीन के साथ व्यापार करना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन किसी सामरिक प्रतिद्वंद्वी पर महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रों के लिए अत्यधिक निर्भर हो जाना निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
खिलौनों से लेकर दवाओं तक: चीन पर बढ़ती निर्भरता
यदि हम भारत के आयात की प्रकृति को देखें, तो पता चलता है कि चीन से हमारी निर्भरता केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सौर ऊर्जा उपकरण, औद्योगिक कलपुर्जों और दवाओं के कच्चे माल जैसे अनेक क्षेत्रों में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका है।
खिलौनों का उदाहरण भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। एक समय भारत के खिलौना बाजार में चीनी उत्पादों की बड़ी हिस्सेदारी थी। सस्ते आयात के कारण घरेलू निर्माताओं के लिए प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो जाता था। बाद में भारत सरकार ने खिलौनों के आयात पर गुणवत्ता नियंत्रण संबंधी नियमों और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के उपायों के माध्यम से इस क्षेत्र में बदलाव लाने की कोशिश की।
लेकिन खिलौनों के मामले में सुधार की कोशिशों के बावजूद इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और दूसरे औद्योगिक क्षेत्रों में आयात पर निर्भरता की चुनौती बनी हुई है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल दवाओं के कच्चे माल का है। दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सक्रिय औषधीय घटकों को API यानी Active Pharmaceutical Ingredients कहा जाता है। इसके अलावा कई प्रकार के औषधीय मध्यवर्ती रसायन और अन्य कच्चे पदार्थ भी दवा निर्माण के लिए आवश्यक होते हैं।
भारत दुनिया के प्रमुख जेनेरिक दवा उत्पादकों में शामिल है। भारतीय दवाएं अनेक देशों में पहुंचती हैं। लेकिन दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कुछ महत्वपूर्ण कच्चे माल और सक्रिय औषधीय घटकों के लिए भारत की चीन पर निर्भरता लंबे समय से चिंता का विषय रही है।
इस स्थिति का एक ऐतिहासिक पक्ष भी है। भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की कई औषधि कंपनियां दवाओं और उनसे जुड़े कच्चे माल के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। इनमें इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड (IDPL) और हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स लिमिटेड (HAL) जैसी कंपनियां शामिल थीं।
समय के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धा, उत्पादन लागत, सरकारी नीतियों और घरेलू उद्योगों की चुनौतियों के कारण भारत के औषधीय कच्चे माल के उत्पादन का स्वरूप बदला। चीन ने बड़े पैमाने पर उत्पादन, सरकारी समर्थन, औद्योगिक समूहों और प्रतिस्पर्धी कीमतों के आधार पर इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत की।
जब चीन में उत्पादित कच्चा माल भारतीय निर्माताओं को घरेलू उत्पादन की तुलना में सस्ता मिलने लगा, तो आयात की ओर झुकाव बढ़ा। तत्कालीन लागत के लिहाज से यह फैसला कंपनियों को लाभकारी लग सकता था, लेकिन दीर्घकाल में इससे घरेलू उत्पादन क्षमता और आपूर्ति सुरक्षा पर दबाव पड़ा।
उदारीकरण की शुरुआत 1991 में हुई थी, जब मनमोहन सिंह केंद्रीय वित्त मंत्री थे। हालांकि, चीन पर औषधीय कच्चे माल की निर्भरता बढ़ने की प्रक्रिया को केवल उदारीकरण के एक फैसले का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। इसके पीछे कई दशकों में विकसित हुई औद्योगिक नीतियां, लागत संबंधी प्रतिस्पर्धा, घरेलू उत्पादन में निवेश की कमी और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का विस्तार भी जिम्मेदार रहे हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत महत्वपूर्ण दवाओं के कच्चे माल के घरेलू उत्पादन को बढ़ाए, अनुसंधान एवं विकास में निवेश करे और आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत तैयार करे। दवाओं जैसे आवश्यक क्षेत्र में किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए भी चुनौती बन सकती है।
सौर ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक्स में भी आत्मनिर्भरता जरूरी
भारत में सौर ऊर्जा के विस्तार की अपार संभावनाएं हैं। इससे बिजली उत्पादन की लागत कम करने, जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिल सकती है। लेकिन सौर ऊर्जा के उपकरणों और उनसे जुड़ी आपूर्ति शृंखला में चीन की बड़ी भूमिका भारत के सामने एक चुनौती पेश करती है।
सौर पैनल, सेल, वेफर और उनसे संबंधित उपकरणों के निर्माण में चीन की मजबूत स्थिति है। यदि भारत सौर ऊर्जा का विस्तार करने के लिए बड़े पैमाने पर उपकरणों का आयात करता है, तो इससे एक ओर स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिलता है, लेकिन दूसरी ओर महत्वपूर्ण उपकरणों की आपूर्ति के लिए विदेशी निर्भरता भी बनी रहती है।
इसी प्रकार कंप्यूटर, मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और औद्योगिक मशीनरी में इस्तेमाल होने वाले अनेक कलपुर्जों के मामले में भी भारत को घरेलू विनिर्माण क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है।
भारत के लाखों युवा सूचना प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, सॉफ्टवेयर और तकनीकी क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। देश के पास प्रतिभा की कमी नहीं है। चुनौती यह है कि इस प्रतिभा को अनुसंधान, डिजाइन, विनिर्माण और उच्च तकनीकी उत्पादों के विकास से किस प्रकार जोड़ा जाए।
यदि भारत केवल तैयार उत्पादों का बड़ा बाजार बनकर रह जाता है और उनके महत्वपूर्ण कलपुर्जों तथा तकनीक के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहता है, तो आर्थिक विकास के बावजूद उसकी रणनीतिक स्वायत्तता सीमित रह सकती है।
इसलिए आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल देश में उत्पादों की असेंबलिंग करना नहीं होना चाहिए। इसके लिए घरेलू अनुसंधान, तकनीकी नवाचार, कुशल श्रम, मजबूत आपूर्ति शृंखला और प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षमता भी जरूरी है।
आर्थिक शक्ति ही सैन्य शक्ति को भी आधार देती है
किसी भी देश की सैन्य शक्ति केवल सैनिकों और हथियारों की संख्या से तय नहीं होती। इसके पीछे उसकी आर्थिक क्षमता, औद्योगिक आधार, तकनीकी विकास और अनुसंधान की शक्ति भी होती है।
चीन ने पिछले दशकों में विनिर्माण, बुनियादी ढांचे, निर्यात और तकनीकी उत्पादन के क्षेत्रों में उल्लेखनीय क्षमता विकसित की है। इससे उसे अपनी सैन्य तैयारियों और रक्षा उद्योग को मजबूत करने के लिए भी संसाधन मिलते हैं।
भारत को भी इसी व्यापक दृष्टिकोण के साथ अपनी आर्थिक नीतियों पर विचार करना चाहिए। यदि देश को आधुनिक हथियारों, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों और रक्षा उपकरणों की आवश्यकता है, तो इनके निर्माण में घरेलू उद्योगों और अनुसंधान संस्थानों की भूमिका बढ़ानी होगी।
सवाल यह नहीं है कि भारत चीन के साथ व्यापार पूरी तरह बंद कर दे। ऐसा करना व्यावहारिक भी नहीं है और हर परिस्थिति में आवश्यक भी नहीं। असली सवाल यह है कि क्या भारत अपने महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निर्भरता कम कर सकता है और क्या वह घरेलू उत्पादन को इतना प्रतिस्पर्धी बना सकता है कि देश की आवश्यकताओं की पूर्ति संकट के समय भी होती रहे?
उद्योगपतियों की भूमिका और सरकार की जवाबदेही
भारत में अडानी और अंबानी जैसे बड़े उद्योग समूहों की आर्थिक गतिविधियों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। किसी भी बड़े उद्योग समूह से यह अपेक्षा की जाती है कि वह निवेश, रोजगार, अनुसंधान, तकनीकी विकास और घरेलू उत्पादन के विस्तार में योगदान दे।
यदि भारत को चीन पर निर्भरता कम करनी है, तो बड़े उद्योग समूहों को केवल बाजार के अवसरों का लाभ उठाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें देश में अनुसंधान एवं विकास, उन्नत विनिर्माण, औषधीय कच्चे माल, इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर उपकरणों और महत्वपूर्ण औद्योगिक कलपुर्जों के उत्पादन में निवेश करना चाहिए।
यह भी जरूरी है कि उद्योगों की भूमिका का मूल्यांकन ठोस तथ्यों के आधार पर हो। रोजगार, निवेश, अनुसंधान, उत्पादन और निर्यात के आंकड़े बताएंगे कि देश की आर्थिक क्षमता मजबूत करने में कौन कितना योगदान दे रहा है।
सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ऐसी नीतियां बनाए, जिनसे घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन मिले, प्रतिस्पर्धा बनी रहे और राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग देश की दीर्घकालीन जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाए।
उदारीकरण, वैश्वीकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चुनौती
भारत की आर्थिक नीतियों पर चर्चा करते समय उदारीकरण और वैश्वीकरण के प्रभावों को भी समझना जरूरी है। वर्ष 1991 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में व्यापक बदलाव हुए। विदेशी निवेश, निजी क्षेत्र, व्यापार और सेवाओं के विस्तार से अर्थव्यवस्था को कई लाभ मिले, लेकिन इसके साथ कुछ क्षेत्रों में नई चुनौतियां भी पैदा हुईं।
यह सवाल उठता है कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक किस हद तक पहुंचा है। गांवों से शहरों की ओर बढ़ता पलायन, कृषि पर दबाव, असमान विकास और रोजगार की प्रकृति में बदलाव जैसी समस्याओं पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
देश की अर्थव्यवस्था का मजबूत होना तभी सार्थक होगा, जब इससे आम नागरिकों को स्थायी रोजगार मिले, ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो और देश अपनी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अत्यधिक विदेशी निर्भरता से बच सके।
ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारत को दीर्घकालीन रणनीति अपनानी होगी। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आपूर्ति में व्यवधान भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। सौर ऊर्जा, अन्य नवीकरणीय स्रोतों, ऊर्जा भंडारण और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देकर इन चुनौतियों का प्रभाव कम किया जा सकता है।
भारत की बड़ी आबादी एक विशाल बाजार भी है और एक बड़ी जिम्मेदारी भी। यदि देश केवल उपभोग बढ़ाता रहे, लेकिन उसके अनुरूप उत्पादन, रोजगार और तकनीकी क्षमता विकसित न हो, तो आर्थिक असंतुलन पैदा हो सकता है।
अटल बिहारी वाजपेयी की स्वावलंबी राष्ट्र की परिकल्पना
अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक दृष्टिकोण में राष्ट्रीय स्वाभिमान और भारत की स्वतंत्र सामरिक पहचान का महत्वपूर्ण स्थान था। उनकी सरकार के समय भारत ने परमाणु परीक्षण किए और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच अपनी सामरिक स्थिति स्पष्ट की। उनके कार्यकाल में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण पहल हुई।
उनकी नीतियों और दृष्टिकोण को देखते हुए यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि क्या भारत ने बाद के वर्षों में आर्थिक स्वावलंबन को पर्याप्त प्राथमिकता दी?
मनमोहन सिंह एक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री थे और उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में 1991 के आर्थिक सुधारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रधानमंत्री के रूप में उनके दस वर्षों के कार्यकाल में भारत की अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार का विस्तार हुआ, लेकिन चीन के साथ व्यापार घाटा भी बढ़ा।
नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसे अभियानों के माध्यम से घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की बात कही। इसके बावजूद चीन से आयात और कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निर्भरता की समस्या बनी हुई है।
इसलिए यह कहना कि भारत को आत्मनिर्भर बनाने की चुनौती केवल किसी एक सरकार की देन है, पूरी तस्वीर को नहीं दर्शाता। लेकिन यह आलोचना अवश्य की जा सकती है कि अलग-अलग सरकारें चीन पर निर्भरता कम करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के मामले में अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं कर सकीं।
वाजपेयी की स्वावलंबी राष्ट्र की परिकल्पना का वास्तविक मूल्यांकन इसी आधार पर होना चाहिए कि भारत कितना मजबूत औद्योगिक आधार विकसित कर पाया, कितनी तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल कर पाया और अपनी सामरिक जरूरतों को पूरा करने में कितना सक्षम हुआ।
राहुल गांधी और विपक्ष की भी है जवाबदेही
आज राहुल गांधी चीन से संबंधित अनेक मुद्दे उठाते हैं और सरकार की नीतियों पर सवाल करते हैं। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि वर्ष 2004 से 2014 तक केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की सरकार थी। उस समय मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और राहुल गांधी तथा सोनिया गांधी कांग्रेस के प्रमुख राजनीतिक चेहरों में शामिल थे।
इसलिए चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे और आर्थिक निर्भरता पर चर्चा करते समय उस दौर की सरकार की नीतियों की समीक्षा भी जरूरी है। विपक्ष का दायित्व सरकार से सवाल पूछना है, लेकिन जिन नीतिगत समस्याओं की जड़ें उसके अपने शासनकाल में भी रही हों, उन पर उसे भी स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
इसी तरह वर्तमान सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह केवल आत्मनिर्भरता के नारे तक सीमित न रहे, बल्कि महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आयात निर्भरता घटाने, घरेलू अनुसंधान बढ़ाने और रोजगार सृजन के ठोस परिणाम सामने रखे।
राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता जैसे मुद्दों पर राजनीतिक दलों को आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर दीर्घकालीन राष्ट्रीय रणनीति तैयार करनी चाहिए।
बढ़ता व्यापार घाटा और चीन पर निर्भरता देश के लिए चिंता का विषय
भारत और चीन के बीच बढ़ता व्यापार घाटा केवल आर्थिक आंकड़ों का मामला नहीं है। यह देश की औद्योगिक क्षमता, तकनीकी विकास, स्वास्थ्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक स्वायत्तता से भी जुड़ा हुआ है।
यदि भारत दवाओं के कच्चे माल, सौर उपकरणों, इलेक्ट्रॉनिक्स और महत्वपूर्ण औद्योगिक कलपुर्जों के लिए अत्यधिक आयात पर निर्भर रहता है, तो किसी अंतरराष्ट्रीय तनाव या आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में देश को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
अटल बिहारी वाजपेयी की स्वावलंबी राष्ट्र की परिकल्पना को आज के संदर्भ में देखने की जरूरत है। मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों और नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत अभियान का मूल्यांकन केवल घोषणाओं के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक परिणामों के आधार पर होना चाहिए।
भारत को चीन के साथ व्यापार करना चाहिए, लेकिन अपनी आवश्यकताओं और राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर नहीं। देश को ऐसी अर्थव्यवस्था बनानी होगी, जिसमें दवाओं का महत्वपूर्ण कच्चा माल, आधुनिक तकनीक, सौर उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जे और रक्षा संबंधी आवश्यकताएं पूरी करने की पर्याप्त घरेलू क्षमता हो।
बड़े उद्योगपतियों को अनुसंधान और उत्पादन में निवेश करना होगा। सरकार को दीर्घकालीन औद्योगिक नीति बनानी होगी। विपक्ष को भी अपनी पुरानी नीतियों की समीक्षा करनी होगी। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश को आत्मनिर्भरता के नारे से आगे बढ़कर वास्तविक आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल करनी होगी।
आज चीन की आर्थिक और सामरिक शक्ति भारत के सामने एक बड़ी चुनौती है। सीमा पर तनाव और आधुनिक सैन्य तैयारियों की खबरें हमें याद दिलाती हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए मजबूत अर्थव्यवस्था अनिवार्य है।
अंततः सवाल यही है कि भारत अपने सबसे बड़े सामरिक प्रतिद्वंद्वी पर निर्भरता कम करने के लिए कितनी गंभीरता से काम करेगा? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार और विपक्ष के नेता राहुल गांधी इस चुनौती पर मिलकर कोई राष्ट्रीय सहमति बना पाएंगे? क्या हमारे बड़े उद्योगपति देश के संसाधनों और बाजार का उपयोग घरेलू उत्पादन तथा अनुसंधान को मजबूत करने में करेंगे?
इन सवालों के जवाब आने वाला समय देगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि बढ़ता व्यापार घाटा और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीन पर निर्भरता भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है। यदि भारत को वास्तव में स्वावलंबी और सामरिक रूप से मजबूत राष्ट्र बनना है, तो उसे इस चुनौती का समाधान प्राथमिकता के आधार पर करना होगा।
यदि हम अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल की तुलना करें, तो चीन के साथ व्यापारिक संबंधों और व्यापार घाटे का सवाल गंभीर रूप से सामने आता है। अटल बिहारी वाजपेयी लगभग छह वर्ष प्रधानमंत्री रहे। उनके कार्यकाल में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगभग 1 बिलियन डॉलर अपेक्षाकृत कम था। इसके बाद मनमोहन सिंह के दस वर्षों के प्रधानमंत्रित्व काल में यह बढ़कर 50 गुना हो गया और नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में बढ़कर 100 गुना हो गया।
यहां सवाल केवल व्यापार घाटे का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या हम अपने सबसे बड़े सामरिक प्रतिद्वंद्वी को आर्थिक रूप से मजबूत करते हुए अपनी ही सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को बढ़ा रहे हैं?
सीमा पर चीन की रणनीति और भारत के सामने नई चुनौती
चीन की सैन्य तैयारियों और सीमा पर उसकी गतिविधियों को लेकर समय-समय पर गंभीर चिंताएं सामने आती रही हैं। भारत-चीन सीमा पर विवाद केवल दो देशों के बीच जमीन के किसी टुकड़े का विवाद नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सामरिक तैयारी और आर्थिक शक्ति से भी जुड़ा हुआ विषय है।
हाल के दिनों में अरुणाचल प्रदेश की सीमा से जुड़ी गतिविधियों और चीन की आधुनिक सैन्य तैयारियों को लेकर चिंता व्यक्त की गई है। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर के सामने आए बयान में भी आधुनिक तकनीक, ड्रोन और ड्रोन-रोधी क्षमताओं की आवश्यकता पर जोर दिए जाने की बात कही गई है। इस तरह की चिंताएं हमें यह सोचने के लिए विवश करती हैं कि बदलती सैन्य परिस्थितियों के अनुरूप भारत अपनी तैयारियों को कितना मजबूत कर रहा है।
आधुनिक युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं लड़े जाते। ड्रोन, निगरानी प्रणालियां, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता, संचार तकनीक और आधुनिक रक्षा उपकरणों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए भारत को भी अपनी रक्षा तैयारियों में इन क्षेत्रों पर पर्याप्त निवेश करना होगा।
लेकिन इसके साथ एक दूसरा सवाल भी है। यदि चीन लगातार अपनी सैन्य और तकनीकी क्षमताओं को बढ़ा रहा है, तो उसकी आर्थिक शक्ति का स्रोत क्या है? उसकी विनिर्माण क्षमता, निर्यात और वैश्विक व्यापार में बढ़ती हिस्सेदारी उसे संसाधन उपलब्ध कराती है। ऐसे में भारत को अपनी आर्थिक और औद्योगिक क्षमता मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि वह सामरिक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके।
1962 से सलामी स्लाइसिंग तक: चीन की रणनीति में बदलाव
भारत और चीन के संबंधों का इतिहास कई गंभीर घटनाओं से भरा हुआ है। वर्ष 1962 में चीन के साथ युद्ध ने भारत की सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को उजागर कर दिया था। उस समय हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा भी दोनों देशों के बीच युद्ध को रोक नहीं सका। चीन के साथ सीमा विवाद और उसके द्वारा भारतीय क्षेत्र पर कब्जे के आरोप लंबे समय से भारत की सामरिक चिंताओं का हिस्सा रहे हैं।
समय के साथ चीन ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। वह केवल प्रत्यक्ष युद्ध की स्थिति पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में धीरे-धीरे दबाव बनाने, बुनियादी ढांचे का विस्तार करने और अपनी उपस्थिति मजबूत करने की रणनीति भी अपनाता है। इस रणनीति को आम तौर पर सलामी स्लाइसिंग कहा जाता है।
सलामी स्लाइसिंग का अर्थ है किसी बड़े क्षेत्र पर एक साथ कब्जा करने के बजाय छोटे-छोटे कदमों के माध्यम से धीरे-धीरे अपनी स्थिति मजबूत करना और प्रतिद्वंद्वी के सामने नई परिस्थितियां पैदा करना। भारत-चीन सीमा पर होने वाली कुछ गतिविधियों को इसी दृष्टिकोण से देखा जाता है।
चीन और भारत के बीच 1967 में नाथू ला और चो ला में संघर्ष हुआ। 1975 में अरुणाचल प्रदेश के तुलुंग ला क्षेत्र में भारतीय सैनिकों की हत्या की घटना सामने आई। 1986-87 में सुमदोरोंग चू को लेकर तनाव बढ़ा। वर्ष 2013 में दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में गतिरोध हुआ, जबकि 2014 में चुमार क्षेत्र में भी विवाद सामने आया।
वर्ष 2017 में डोकलाम में भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने आ गईं। इसके बाद 2020 में गलवान घाटी में हिंसक झड़प हुई, जिसमें भारत के 20 सैनिक शहीद हुए। इस संघर्ष में चीनी पक्ष को भी हताहतों का सामना करना पड़ा। बाद के वर्षों में भी सीमा पर तनाव और सैन्य गतिरोध की स्थितियां बनी रहीं।
इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि चीन के साथ सीमा विवाद कोई नई समस्या नहीं है। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी सीमा की सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक, तकनीकी और औद्योगिक क्षमताओं को भी मजबूत करे।
अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में व्यापार घाटा
अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल की तुलना में मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा तेजी से बढ़ा। नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भी यह वृद्धि जारी रही। इस स्थिति को केवल किसी एक प्रधानमंत्री की नीतियों से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि इसमें वैश्विक व्यापार, घरेलू उत्पादन, औद्योगिक नीतियों, आयात की मांग और चीन की विनिर्माण क्षमता जैसे अनेक कारकों की भूमिका है।
फिर भी, यह सवाल अपनी जगह कायम है कि भारत ने चीन से आयात पर बढ़ती निर्भरता को कम करने के लिए पर्याप्त कदम क्यों नहीं उठाए? क्या हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए घरेलू उद्योगों को पर्याप्त प्रोत्साहन दे पाए? और क्या हमारी आर्थिक नीतियां देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अपेक्षित परिणाम दे सकी हैं?
इन प्रश्नों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। चीन के साथ व्यापार करना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन किसी सामरिक प्रतिद्वंद्वी पर महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रों के लिए अत्यधिक निर्भर हो जाना निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
खिलौनों से लेकर दवाओं तक: चीन पर बढ़ती निर्भरता
यदि हम भारत के आयात की प्रकृति को देखें, तो पता चलता है कि चीन से हमारी निर्भरता केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सौर ऊर्जा उपकरण, औद्योगिक कलपुर्जों और दवाओं के कच्चे माल जैसे अनेक क्षेत्रों में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका है।
खिलौनों का उदाहरण भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। एक समय भारत के खिलौना बाजार में चीनी उत्पादों की बड़ी हिस्सेदारी थी। सस्ते आयात के कारण घरेलू निर्माताओं के लिए प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो जाता था। बाद में भारत सरकार ने खिलौनों के आयात पर गुणवत्ता नियंत्रण संबंधी नियमों और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के उपायों के माध्यम से इस क्षेत्र में बदलाव लाने की कोशिश की।
लेकिन खिलौनों के मामले में सुधार की कोशिशों के बावजूद इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और दूसरे औद्योगिक क्षेत्रों में आयात पर निर्भरता की चुनौती बनी हुई है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल दवाओं के कच्चे माल का है। दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सक्रिय औषधीय घटकों को API यानी Active Pharmaceutical Ingredients कहा जाता है। इसके अलावा कई प्रकार के औषधीय मध्यवर्ती रसायन और अन्य कच्चे पदार्थ भी दवा निर्माण के लिए आवश्यक होते हैं।
भारत दुनिया के प्रमुख जेनेरिक दवा उत्पादकों में शामिल है। भारतीय दवाएं अनेक देशों में पहुंचती हैं। लेकिन दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कुछ महत्वपूर्ण कच्चे माल और सक्रिय औषधीय घटकों के लिए भारत की चीन पर निर्भरता लंबे समय से चिंता का विषय रही है।
इस स्थिति का एक ऐतिहासिक पक्ष भी है। भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की कई औषधि कंपनियां दवाओं और उनसे जुड़े कच्चे माल के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। इनमें इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड (IDPL) और हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स लिमिटेड (HAL) जैसी कंपनियां शामिल थीं।
समय के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धा, उत्पादन लागत, सरकारी नीतियों और घरेलू उद्योगों की चुनौतियों के कारण भारत के औषधीय कच्चे माल के उत्पादन का स्वरूप बदला। चीन ने बड़े पैमाने पर उत्पादन, सरकारी समर्थन, औद्योगिक समूहों और प्रतिस्पर्धी कीमतों के आधार पर इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत की।
जब चीन में उत्पादित कच्चा माल भारतीय निर्माताओं को घरेलू उत्पादन की तुलना में सस्ता मिलने लगा, तो आयात की ओर झुकाव बढ़ा। तत्कालीन लागत के लिहाज से यह फैसला कंपनियों को लाभकारी लग सकता था, लेकिन दीर्घकाल में इससे घरेलू उत्पादन क्षमता और आपूर्ति सुरक्षा पर दबाव पड़ा।
उदारीकरण की शुरुआत 1991 में हुई थी, जब मनमोहन सिंह केंद्रीय वित्त मंत्री थे। हालांकि, चीन पर औषधीय कच्चे माल की निर्भरता बढ़ने की प्रक्रिया को केवल उदारीकरण के एक फैसले का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। इसके पीछे कई दशकों में विकसित हुई औद्योगिक नीतियां, लागत संबंधी प्रतिस्पर्धा, घरेलू उत्पादन में निवेश की कमी और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का विस्तार भी जिम्मेदार रहे हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत महत्वपूर्ण दवाओं के कच्चे माल के घरेलू उत्पादन को बढ़ाए, अनुसंधान एवं विकास में निवेश करे और आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत तैयार करे। दवाओं जैसे आवश्यक क्षेत्र में किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए भी चुनौती बन सकती है।
सौर ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक्स में भी आत्मनिर्भरता जरूरी
भारत में सौर ऊर्जा के विस्तार की अपार संभावनाएं हैं। इससे बिजली उत्पादन की लागत कम करने, जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिल सकती है। लेकिन सौर ऊर्जा के उपकरणों और उनसे जुड़ी आपूर्ति शृंखला में चीन की बड़ी भूमिका भारत के सामने एक चुनौती पेश करती है।
सौर पैनल, सेल, वेफर और उनसे संबंधित उपकरणों के निर्माण में चीन की मजबूत स्थिति है। यदि भारत सौर ऊर्जा का विस्तार करने के लिए बड़े पैमाने पर उपकरणों का आयात करता है, तो इससे एक ओर स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिलता है, लेकिन दूसरी ओर महत्वपूर्ण उपकरणों की आपूर्ति के लिए विदेशी निर्भरता भी बनी रहती है।
इसी प्रकार कंप्यूटर, मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और औद्योगिक मशीनरी में इस्तेमाल होने वाले अनेक कलपुर्जों के मामले में भी भारत को घरेलू विनिर्माण क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है।
भारत के लाखों युवा सूचना प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, सॉफ्टवेयर और तकनीकी क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। देश के पास प्रतिभा की कमी नहीं है। चुनौती यह है कि इस प्रतिभा को अनुसंधान, डिजाइन, विनिर्माण और उच्च तकनीकी उत्पादों के विकास से किस प्रकार जोड़ा जाए।
यदि भारत केवल तैयार उत्पादों का बड़ा बाजार बनकर रह जाता है और उनके महत्वपूर्ण कलपुर्जों तथा तकनीक के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहता है, तो आर्थिक विकास के बावजूद उसकी रणनीतिक स्वायत्तता सीमित रह सकती है।
इसलिए आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल देश में उत्पादों की असेंबलिंग करना नहीं होना चाहिए। इसके लिए घरेलू अनुसंधान, तकनीकी नवाचार, कुशल श्रम, मजबूत आपूर्ति शृंखला और प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षमता भी जरूरी है।
आर्थिक शक्ति ही सैन्य शक्ति को भी आधार देती है
किसी भी देश की सैन्य शक्ति केवल सैनिकों और हथियारों की संख्या से तय नहीं होती। इसके पीछे उसकी आर्थिक क्षमता, औद्योगिक आधार, तकनीकी विकास और अनुसंधान की शक्ति भी होती है।
चीन ने पिछले दशकों में विनिर्माण, बुनियादी ढांचे, निर्यात और तकनीकी उत्पादन के क्षेत्रों में उल्लेखनीय क्षमता विकसित की है। इससे उसे अपनी सैन्य तैयारियों और रक्षा उद्योग को मजबूत करने के लिए भी संसाधन मिलते हैं।
भारत को भी इसी व्यापक दृष्टिकोण के साथ अपनी आर्थिक नीतियों पर विचार करना चाहिए। यदि देश को आधुनिक हथियारों, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों और रक्षा उपकरणों की आवश्यकता है, तो इनके निर्माण में घरेलू उद्योगों और अनुसंधान संस्थानों की भूमिका बढ़ानी होगी।
सवाल यह नहीं है कि भारत चीन के साथ व्यापार पूरी तरह बंद कर दे। ऐसा करना व्यावहारिक भी नहीं है और हर परिस्थिति में आवश्यक भी नहीं। असली सवाल यह है कि क्या भारत अपने महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निर्भरता कम कर सकता है और क्या वह घरेलू उत्पादन को इतना प्रतिस्पर्धी बना सकता है कि देश की आवश्यकताओं की पूर्ति संकट के समय भी होती रहे?
उद्योगपतियों की भूमिका और सरकार की जवाबदेही
भारत में अडानी और अंबानी जैसे बड़े उद्योग समूहों की आर्थिक गतिविधियों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। किसी भी बड़े उद्योग समूह से यह अपेक्षा की जाती है कि वह निवेश, रोजगार, अनुसंधान, तकनीकी विकास और घरेलू उत्पादन के विस्तार में योगदान दे।
यदि भारत को चीन पर निर्भरता कम करनी है, तो बड़े उद्योग समूहों को केवल बाजार के अवसरों का लाभ उठाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें देश में अनुसंधान एवं विकास, उन्नत विनिर्माण, औषधीय कच्चे माल, इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर उपकरणों और महत्वपूर्ण औद्योगिक कलपुर्जों के उत्पादन में निवेश करना चाहिए।
यह भी जरूरी है कि उद्योगों की भूमिका का मूल्यांकन ठोस तथ्यों के आधार पर हो। रोजगार, निवेश, अनुसंधान, उत्पादन और निर्यात के आंकड़े बताएंगे कि देश की आर्थिक क्षमता मजबूत करने में कौन कितना योगदान दे रहा है।
सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ऐसी नीतियां बनाए, जिनसे घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन मिले, प्रतिस्पर्धा बनी रहे और राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग देश की दीर्घकालीन जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाए।
उदारीकरण, वैश्वीकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चुनौती
भारत की आर्थिक नीतियों पर चर्चा करते समय उदारीकरण और वैश्वीकरण के प्रभावों को भी समझना जरूरी है। वर्ष 1991 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में व्यापक बदलाव हुए। विदेशी निवेश, निजी क्षेत्र, व्यापार और सेवाओं के विस्तार से अर्थव्यवस्था को कई लाभ मिले, लेकिन इसके साथ कुछ क्षेत्रों में नई चुनौतियां भी पैदा हुईं।
यह सवाल उठता है कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक किस हद तक पहुंचा है। गांवों से शहरों की ओर बढ़ता पलायन, कृषि पर दबाव, असमान विकास और रोजगार की प्रकृति में बदलाव जैसी समस्याओं पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
देश की अर्थव्यवस्था का मजबूत होना तभी सार्थक होगा, जब इससे आम नागरिकों को स्थायी रोजगार मिले, ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो और देश अपनी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अत्यधिक विदेशी निर्भरता से बच सके।
ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारत को दीर्घकालीन रणनीति अपनानी होगी। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आपूर्ति में व्यवधान भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। सौर ऊर्जा, अन्य नवीकरणीय स्रोतों, ऊर्जा भंडारण और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देकर इन चुनौतियों का प्रभाव कम किया जा सकता है।
भारत की बड़ी आबादी एक विशाल बाजार भी है और एक बड़ी जिम्मेदारी भी। यदि देश केवल उपभोग बढ़ाता रहे, लेकिन उसके अनुरूप उत्पादन, रोजगार और तकनीकी क्षमता विकसित न हो, तो आर्थिक असंतुलन पैदा हो सकता है।
अटल बिहारी वाजपेयी की स्वावलंबी राष्ट्र की परिकल्पना
अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक दृष्टिकोण में राष्ट्रीय स्वाभिमान और भारत की स्वतंत्र सामरिक पहचान का महत्वपूर्ण स्थान था। उनकी सरकार के समय भारत ने परमाणु परीक्षण किए और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच अपनी सामरिक स्थिति स्पष्ट की। उनके कार्यकाल में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण पहल हुई।
उनकी नीतियों और दृष्टिकोण को देखते हुए यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि क्या भारत ने बाद के वर्षों में आर्थिक स्वावलंबन को पर्याप्त प्राथमिकता दी?
मनमोहन सिंह एक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री थे और उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में 1991 के आर्थिक सुधारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रधानमंत्री के रूप में उनके दस वर्षों के कार्यकाल में भारत की अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार का विस्तार हुआ, लेकिन चीन के साथ व्यापार घाटा भी बढ़ा।
नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसे अभियानों के माध्यम से घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की बात कही। इसके बावजूद चीन से आयात और कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निर्भरता की समस्या बनी हुई है।
27th October, 2026
