यूरीड मीडिया- कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव विद्यार्थियों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इन चुनावों के जरिए विद्यार्थियों को मतदान, प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को नजदीक से समझने का अवसर मिलता है। छात्र जीवन में ही लोकतांत्रिक मूल्यों का व्यावहारिक अनुभव मिलने से भविष्य में जिम्मेदार नागरिक और जनप्रतिनिधि तैयार होने की संभावनाएं बढ़ती हैं।
1. छात्र संघ चुनाव कराना चाहिए तो क्यों?
छात्र संघ विद्यार्थियों की समस्याओं को विश्वविद्यालय प्रशासन तक पहुंचाने का एक व्यवस्थित मंच भी प्रदान करते हैं। पुस्तकालय, छात्रावास, फीस, छात्रवृत्ति, परीक्षा व्यवस्था, शिक्षकों की उपलब्धता, परिवहन और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं को निर्वाचित प्रतिनिधि सामूहिक रूप से उठा सकते हैं। इससे व्यक्तिगत शिकायतों को संस्थागत स्तर पर रखने और उनके समाधान के लिए प्रशासन से जवाबदेही मांगने का अवसर मिलता है।
छात्र राजनीति देश को भविष्य का नेतृत्व देने की प्रक्रिया में भी भूमिका निभाती है। विश्वविद्यालयों में चुनाव लड़ने वाले विद्यार्थी संगठन बनाने, जनसमस्याओं को समझने, संवाद करने, मतभेदों का सामना करने और अपने पक्ष में समर्थन जुटाने का अनुभव प्राप्त करते हैं। यही अनुभव आगे चलकर सामाजिक कार्य, सार्वजनिक जीवन और राजनीति में उपयोगी हो सकता है।
इसके अतिरिक्त, निर्वाचित छात्र संघ विद्यार्थियों और प्रशासन के बीच संवाद का माध्यम बन सकते हैं। यदि किसी परिसर में विद्यार्थियों के बीच असंतोष बढ़ता है, तो प्रतिनिधियों के माध्यम से उनकी शिकायतें समय रहते सामने आ सकती हैं। इस प्रकार, नियमित और निष्पक्ष चुनाव विद्यार्थियों को अपनी बात रखने का लोकतांत्रिक अवसर देने के साथ-साथ परिसर में संवाद और जवाबदेही की व्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं।
2. छात्र संघ चुनाव न कराने के नुकसान
विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव लंबे समय तक बंद रहने से विद्यार्थियों के पास अपनी समस्याओं को सामूहिक रूप से उठाने के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों का मंच नहीं रह जाता। ऐसी स्थिति में फीस वृद्धि, छात्रवृत्ति, परीक्षा परिणामों में देरी, छात्रावासों की समस्याओं और शैक्षणिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दों को प्रशासन तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना कठिन हो सकता है। विद्यार्थियों और प्रशासन के बीच संवाद की औपचारिक व्यवस्था कमजोर पड़ने से असंतोष बढ़ने की आशंका भी रहती है।
चुनाव न होने का असर लोकतांत्रिक प्रशिक्षण पर भी पड़ता है। विश्वविद्यालय केवल डिग्री हासिल करने के केंद्र नहीं हैं, बल्कि युवाओं को नेतृत्व, सार्वजनिक संवाद और नागरिक जिम्मेदारियों का अनुभव देने वाले संस्थान भी हैं। यदि विद्यार्थियों को अपने प्रतिनिधि चुनने का अवसर नहीं मिलता, तो उनके नेतृत्व विकास और लोकतांत्रिक भागीदारी के व्यावहारिक अवसर सीमित हो जाते हैं।
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि छात्र संघ चुनाव न होने से परिसर में अनुशासन और शांति स्वतः सुनिश्चित नहीं हो जाती। छात्र राजनीति से जुड़ी हिंसा चुनाव कराने वाले संस्थानों में हो सकती है, लेकिन चुनाव न कराने वाले परिसरों में भी विवाद और हिंसक घटनाएं संभव हैं। इसलिए हिंसा को रोकने के लिए केवल चुनाव स्थगित करना पर्याप्त उपाय नहीं माना जा सकता। निष्पक्ष चुनाव, स्पष्ट आचार संहिता, जवाबदेह प्रशासन और नियमों का समान रूप से पालन भी आवश्यक हैं।
छात्र संघ चुनावों पर प्रतिबंध का एक राजनीतिक पहलू भी है। राज्य सरकारों और विश्वविद्यालय प्रशासन को कभी-कभी यह आशंका रहती है कि छात्र संघ का निर्वाचित अध्यक्ष परिसर के भीतर एक स्वतंत्र शक्ति केंद्र बन सकता है। इसके अतिरिक्त, छात्र संघ चुनावों के परिणामों को राज्य सरकार के कामकाज के प्रति युवाओं के रुझान के संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है। इस राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण चुनावों को लेकर सरकारों की सतर्कता बढ़ सकती है।
यदि किसी मुख्यमंत्री को यह आशंका हो कि छात्र संघ चुनाव में विरोधी विचारधारा या विपक्ष से जुड़े छात्र संगठन को समर्थन मिल सकता है, तो चुनाव के परिणामों को राजनीतिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा सकता है। ऐसी स्थिति में छात्र संघ चुनावों को केवल विद्यार्थियों के प्रतिनिधित्व का विषय मानने के बजाय राजनीतिक लाभ-हानि के नजरिये से देखने का जोखिम पैदा होता है। इससे चुनाव टालने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल सकता है और विद्यार्थियों के प्रतिनिधित्व का प्रश्न पीछे छूट सकता है।
इसलिए छात्र संघ चुनावों पर निर्णय लेते समय हिंसा की आशंका या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को ही आधार बनाने के बजाय विद्यार्थियों के अधिकार, परिसर की सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और निष्पक्ष चुनाव की व्यवस्था पर ध्यान देना आवश्यक है।
3. वर्तमान में देश एवं राज्यों में छात्र संघ चुनावों की स्थिति
देश के विभिन्न राज्यों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनावों की स्थिति एक जैसी नहीं है। कहीं नियमित चुनाव हो रहे हैं, कहीं कई वर्षों से चुनाव बंद हैं और कहीं उन्हें दोबारा शुरू करने की प्रक्रिया पर विचार किया जा रहा है। हाल के वर्षों में कुछ राज्यों में छात्र संघ चुनावों की बहाली को लेकर पहल होने से यह मुद्दा फिर चर्चा में आया है।
कर्नाटक में विद्यार्थी संघ चुनावों को अनुमति दिए जाने की जानकारी सामने आई है। मध्य प्रदेश में उच्च न्यायालय ने वर्ष 2026 के संदर्भ में नहीं, बल्कि उपलब्ध लेख में उल्लिखित उसी वर्ष की शुरुआत में राज्य में छात्र संघ चुनाव कराने का आदेश दिया था; इस आदेश के वर्तमान क्रियान्वयन की स्थिति की अलग से पुष्टि आवश्यक है। महाराष्ट्र में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग ने छात्र संघ चुनावों की रूपरेखा तैयार करने के लिए मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर सुहास पेडनेकर की अध्यक्षता में 12 सदस्यीय समिति गठित की थी। समिति को अपनी रिपोर्ट देने के लिए एक महीने का समय दिया गया था। ओडिशा में भी चुनाव बहाल करने के लिए हितधारकों से बातचीत किए जाने की जानकारी दी गई थी।
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, असम विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, केरल विश्वविद्यालय और हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में नियमित छात्र संघ चुनाव होने की जानकारी लेख में दी गई है। राज्य विश्वविद्यालयों में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ और पटना विश्वविद्यालय में भी नियमित चुनावों का उल्लेख है।
दूसरी ओर, कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय लंबे समय से छात्र संघ चुनावों से दूर हैं। उपलब्ध लेख के अनुसार, जामिया मिलिया इस्लामिया में 2006 के बाद, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में 1996 के बाद और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में 2018 के बाद छात्र निकाय चुनाव नहीं हुए थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 2018 के बाद, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय में 2019 के बाद और लद्दाख विश्वविद्यालय में 2024 के बाद चुनाव नहीं होने की जानकारी दी गई थी।
उत्तर प्रदेश में छात्र संघ चुनावों की स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। लेख के अनुसार, राज्य के विश्वविद्यालयों में 2018 से चुनावों पर प्रतिबंध रहा है, जबकि अलग-अलग संस्थानों में चुनाव इससे पहले ही स्थगित कर दिए गए थे। मेरठ स्थित चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में 2017 में, दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में 2016 में और लखनऊ विश्वविद्यालय में 2012 में चुनाव स्थगित किए गए थे। हालांकि, इन प्रतिबंधों और चुनावों की बहाली से जुड़ी वर्तमान स्थिति की आधिकारिक पुष्टि अलग से की जानी चाहिए।
बिहार में पटना विश्वविद्यालय में नियमित चुनाव होने की जानकारी दी गई है, जबकि राज्य के अन्य विश्वविद्यालयों में 2018 में चुनाव स्थगित किए जाने का उल्लेख है। पश्चिम बंगाल के जादवपुर विश्वविद्यालय में 2020 से चुनाव नहीं हुए थे। गुजरात के अधिकांश विश्वविद्यालयों में 2023 में छात्र निकाय चुनाव बंद किए जाने की जानकारी भी लेख में दी गई थी।
इस प्रकार, देशभर में छात्र संघ चुनावों की तस्वीर अलग-अलग है। कुछ संस्थानों में चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था का नियमित हिस्सा बने हुए हैं, जबकि अन्य में उनकी बहाली का प्रश्न लंबित है। छात्र संघ चुनावों के भविष्य का निर्धारण करते समय विद्यार्थियों के प्रतिनिधित्व, शैक्षणिक वातावरण, सुरक्षा, निष्पक्षता और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण होगा।
16th October, 2026
