छात्रसंघ चुनावों पर प्रतिबंध से कमजोर हो रही युवा सियासत
राजनीतिक दलों में तेज-तर्रार युवाओं को नहीं मिल रहे नए नेतृत्व के पर्याप्त अवसर
राजेन्द्र द्विवेदी, यूरीड मीडिया- छात्रसंघ चुनाव किसी विश्वविद्यालय में पदाधिकारियों को चुनने की महज एक प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि लोकतांत्रिक नेतृत्व तैयार करने की पहली पाठशाला भी हैं। यहीं से छात्र संगठन, वैचारिक बहस, चुनाव प्रचार, जनसमस्याओं पर आंदोलन और सत्ता से सवाल पूछने की राजनीतिक संस्कृति विकसित होती है। लेकिन जब विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव लंबे समय तक नहीं होते, तो इसका असर केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देश की व्यापक राजनीतिक व्यवस्था और युवा नेतृत्व के विकास पर भी पड़ता है।
भारत में छात्र राजनीति का इतिहास बताता है कि विश्वविद्यालयों ने देश को अनेक चर्चित राजनीतिक चेहरे दिए हैं। जिनमें विश्वनाथ प्रताप सिंह, नारायण दत्त तिवारी, जनेश्वर मिश्र, हेमवती नंदन बहुगुणा, सीताराम येचुरी, प्रकाश करात, कन्हैया कुमार, आरिफ मोहम्मद खान, आजम खान, एम. ए. ए. फातिमी, जावेद हबीब, मनोज सिन्हा, महेंद्र नाथ पांडेय, भरत सिंह, योगेंद्र यादव, अरुण जेटली, विजय गोयल, अजय माकन, अलका लांबा, रेखा गुप्ता, रागिनी नायक, लालू प्रसाद यादव, सुशील कुमार मोदी, रविशंकर प्रसाद, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, बुद्धदेब भट्टाचार्य, प्रणब मुखर्जी, सिद्धार्थ शंकर रे, एन. चंद्रबाबू नायडू, ए. के. एंटनी, रमेश चेन्निथला, के. चंद्रशेखर राव शामिल हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय से भी विभिन्न राजनीतिक दलों में प्रभावशाली व चर्चित चेहरे दिखाई दे रहे हैं जैसे रविदास मेहरोत्रा, अरविंद सिंह गोप, बृजेश पाठक, दया शंकर सिंह, रमेश श्रीवास्तव, पवन पांडेय, राजपाल कश्यप, संतोष सिंह आदि। इसके अलावा बहुत सारे राष्ट्रीय सियासत में छात्रसंघ से निकलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाए हैं। लेकिन चंद विश्वविद्यालय को छोड़कर छात्रसंघ चुनाव पर प्रतिबंध लगा हुआ है।
छात्रसंघ चुनावों पर रोक या उनका लंबे समय तक स्थगित रहना युवाओं के लिए नेतृत्व विकसित करने के औपचारिक अवसरों को सीमित करता है। इसका एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू भी है। छात्रसंघ चुनाव युवाओं को लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का व्यावहारिक अनुभव देते हैं। वे सीखते हैं कि समर्थन कैसे जुटाया जाता है, विरोधी विचारों से कैसे निपटा जाता है, जनसमस्याओं को एजेंडा कैसे बनाया जाता है और मतदाताओं के प्रति जवाबदेही क्या होती है। लेकिन राजनीतिक दलों के कमजोर नेतृत्व ने बड़े सुनियोजित तरीके से तेज-तर्रार युवाओं की सियासत में भागीदारी रोकने के लिए छात्रसंघों पर प्रतिबंध लगा दिया है। दिल्ली, जेएनयू और एएमयू में छात्रसंघ चुनाव से देश की सियासत पर बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। यह बहुत सीमित दायरे में हैं और वे ऑल-राउंडर नहीं होते। देश के हिंदी भाषी राज्यों व दक्षिण के विश्वविद्यालय से जो छात्र सियासत में आए, वे काफी प्रभावित करने वाले होते हैं। इसलिए छात्रसंघ चुनाव पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसी का कारण है कि आज राजनीतिक दलों में युवा नेतृत्व का अभाव हो गया है और जो तेज-तर्रार युवा हैं भी, उन्हें मुख्यधारा से बाहर कर दिया गया है।
देश में आज शैक्षणिक संस्थाओं से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में जनसमस्याओं का अंबार लगा हुआ है, उसको लेकर संघर्ष करने वाला युवा नेतृत्व नहीं रह गया है। जो युवा चेहरे दिखाई दे रहे हैं, वे राजनीतिक घरानों के परिवार से जुड़े या ताकतवर नेताओं के जिंदाबाद करने वाले युवा ही शामिल हैं। इसलिए लोकतंत्र कमजोर पड़ रहा है। संस्थाएं सत्ता के संरक्षण में ताकतवर होकर मनमानी कर रही हैं। तेज-तर्रार नेताओं के अभाव में छात्रसंघों के प्रतिबंधों के कारण तेज-तर्रार युवाओं के अभाव में विपक्ष लकवाग्रस्त होकर आंदोलन कर रहा है, जिसका प्रभाव सरकार पर नहीं पड़ रहा है। क्योंकि लोकतंत्र की पहली पाठशाला पर ताला लगा दिया है।
राजनीतिक दलों में तेज-तर्रार युवाओं को नहीं मिल रहे नए नेतृत्व के पर्याप्त अवसर
राजेन्द्र द्विवेदी, यूरीड मीडिया- छात्रसंघ चुनाव किसी विश्वविद्यालय में पदाधिकारियों को चुनने की महज एक प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि लोकतांत्रिक नेतृत्व तैयार करने की पहली पाठशाला भी हैं। यहीं से छात्र संगठन, वैचारिक बहस, चुनाव प्रचार, जनसमस्याओं पर आंदोलन और सत्ता से सवाल पूछने की राजनीतिक संस्कृति विकसित होती है। लेकिन जब विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव लंबे समय तक नहीं होते, तो इसका असर केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देश की व्यापक राजनीतिक व्यवस्था और युवा नेतृत्व के विकास पर भी पड़ता है।
भारत में छात्र राजनीति का इतिहास बताता है कि विश्वविद्यालयों ने देश को अनेक चर्चित राजनीतिक चेहरे दिए हैं। जिनमें विश्वनाथ प्रताप सिंह, नारायण दत्त तिवारी, जनेश्वर मिश्र, हेमवती नंदन बहुगुणा, सीताराम येचुरी, प्रकाश करात, कन्हैया कुमार, आरिफ मोहम्मद खान, आजम खान, एम. ए. ए. फातिमी, जावेद हबीब, मनोज सिन्हा, महेंद्र नाथ पांडेय, भरत सिंह, योगेंद्र यादव, अरुण जेटली, विजय गोयल, अजय माकन, अलका लांबा, रेखा गुप्ता, रागिनी नायक, लालू प्रसाद यादव, सुशील कुमार मोदी, रविशंकर प्रसाद, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, बुद्धदेब भट्टाचार्य, प्रणब मुखर्जी, सिद्धार्थ शंकर रे, एन. चंद्रबाबू नायडू, ए. के. एंटनी, रमेश चेन्निथला, के. चंद्रशेखर राव शामिल हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय से भी विभिन्न राजनीतिक दलों में प्रभावशाली व चर्चित चेहरे दिखाई दे रहे हैं जैसे रविदास मेहरोत्रा, अरविंद सिंह गोप, बृजेश पाठक, दया शंकर सिंह, रमेश श्रीवास्तव, पवन पांडेय, राजपाल कश्यप, संतोष सिंह आदि। इसके अलावा बहुत सारे राष्ट्रीय सियासत में छात्रसंघ से निकलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाए हैं। लेकिन चंद विश्वविद्यालय को छोड़कर छात्रसंघ चुनाव पर प्रतिबंध लगा हुआ है।
छात्रसंघ चुनावों पर रोक या उनका लंबे समय तक स्थगित रहना युवाओं के लिए नेतृत्व विकसित करने के औपचारिक अवसरों को सीमित करता है। इसका एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू भी है। छात्रसंघ चुनाव युवाओं को लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का व्यावहारिक अनुभव देते हैं। वे सीखते हैं कि समर्थन कैसे जुटाया जाता है, विरोधी विचारों से कैसे निपटा जाता है, जनसमस्याओं को एजेंडा कैसे बनाया जाता है और मतदाताओं के प्रति जवाबदेही क्या होती है। लेकिन राजनीतिक दलों के कमजोर नेतृत्व ने बड़े सुनियोजित तरीके से तेज-तर्रार युवाओं की सियासत में भागीदारी रोकने के लिए छात्रसंघों पर प्रतिबंध लगा दिया है। दिल्ली, जेएनयू और एएमयू में छात्रसंघ चुनाव से देश की सियासत पर बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। यह बहुत सीमित दायरे में हैं और वे ऑल-राउंडर नहीं होते। देश के हिंदी भाषी राज्यों व दक्षिण के विश्वविद्यालय से जो छात्र सियासत में आए, वे काफी प्रभावित करने वाले होते हैं। इसलिए छात्रसंघ चुनाव पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसी का कारण है कि आज राजनीतिक दलों में युवा नेतृत्व का अभाव हो गया है और जो तेज-तर्रार युवा हैं भी, उन्हें मुख्यधारा से बाहर कर दिया गया है।
देश में आज शैक्षणिक संस्थाओं से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में जनसमस्याओं का अंबार लगा हुआ है, उसको लेकर संघर्ष करने वाला युवा नेतृत्व नहीं रह गया है। जो युवा चेहरे दिखाई दे रहे हैं, वे राजनीतिक घरानों के परिवार से जुड़े या ताकतवर नेताओं के जिंदाबाद करने वाले युवा ही शामिल हैं। इसलिए लोकतंत्र कमजोर पड़ रहा है। संस्थाएं सत्ता के संरक्षण में ताकतवर होकर मनमानी कर रही हैं। तेज-तर्रार नेताओं के अभाव में छात्रसंघों के प्रतिबंधों के कारण तेज-तर्रार युवाओं के अभाव में विपक्ष लकवाग्रस्त होकर आंदोलन कर रहा है, जिसका प्रभाव सरकार पर नहीं पड़ रहा है। क्योंकि लोकतंत्र की पहली पाठशाला पर ताला लगा दिया है।
15th October, 2026
