दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में 6 सितंबर 2026 को दोपहर करीब डेढ़ बजे जो घटना घटी, उसने पूरे शहर को झकझोर दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास स्थित एक पांच मंजिला इमारत, जो छात्रों के लिए पेइंग गेस्ट यानी पीजी के रूप में चल रही थी, अचानक ताश के पत्तों की तरह ढह गई। यह इमारत करीब चालीस से पचास साल पुरानी थी और इसमें बेसमेंट के साथ ऊपर की मंजिलें थीं। उस समय वहां मरम्मत का काम चल रहा था। भारी बारिश के बाद बेसमेंट में पानी जमा हो चुका था और बिना उचित सुरक्षा उपायों के तोड़-फोड़ जारी थी। नतीजा यह हुआ कि कमजोर नींव और संरचनात्मक बदलावों के कारण पूरी इमारत पैनकेक कोलैप्स की तरह गिर गई, जिसमें ऊपरी मंजिलें एक के ऊपर एक ढह गईं।
इस हादसे में सात लोगों की जान चली गई। इनमें पांच छात्र और दो मजदूर शामिल थे। मारे गए छात्रों में अर्पित जाज (19 वर्ष, देवास मध्य प्रदेश), अभिषेक कुमार (20 वर्ष, उत्तर प्रदेश), युवराज सोनी (20 वर्ष, दुर्ग छत्तीसगढ़), पवन कुमार (17 वर्ष, औरैया उत्तर प्रदेश) और अक्षत सिंह यादव (18 वर्ष, कटनी मध्य प्रदेश) शामिल थे। दो मजदूर सुरिंदर सिंह और परम लाल कोरी भी इस त्रासदी में मारे गए। बचाव अभियान लगभग सत्ताईस से अट्ठाईस घंटे चला। दिल्ली फायर सर्विस, एनडीआरएफ, पुलिस और अन्य एजेंसियों की टीमें मलबे में फंसे लोगों को निकालने में जुटी रहीं। कुल बारह लोगों को मलबे से बाहर निकाला गया, जिनमें से सात की मौत हो गई और पांच घायल हुए। घायलों में असगर अली, नीरज बावा, आदित्य कुमार, नितिश चिब और मोहम्मद अयान शामिल थे, जिन्हें एम्स ट्रॉमा सेंटर और सफदरजंग अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया।
इमारत का नाम होस्टल डेज था और यह लड़कों के लिए पीजी के रूप में चल रही थी। इसमें करीब पंद्रह कमरे थे और कई छात्र दो-दो या तीन-तीन के कमरों में रह रहे थे। स्थानीय लोगों के अनुसार किराया प्रति बेड लगभग बारह हजार रुपये के आसपास था। इमारत करीब पचपन वर्ग गज के प्लॉट पर बनी थी। इसका मालिकाना हक उर्मिला गुप्ता के नाम पर था, जबकि उनके पति हरिराम गुप्ता, जो वायुसेना से सेवानिवृत्त थे और उम्र अस्सी से ऊपर थी, तथा बेटा महेश गुप्ता इसे संचालित कर रहे थे। पुलिस ने हादसे के बाद इन तीनों को गिरफ्तार किया। इसके अलावा पीजी संचालक और मरम्मत का काम कराने वाले ठेकेदार को भी हिरासत में लिया गया। जांच में सामने आया कि बेसमेंट में अवैध रूप से मलबा डाला जा रहा था और दीवारें हटाई जा रही थीं ताकि जगह बढ़ाई जा सके। भारी बारिश से जमा पानी ने नींव को और कमजोर कर दिया था।
यह घटना अकेली नहीं है। दिल्ली में इस साल अब तक पांच इमारतें गिर चुकी हैं, जिनमें कुल सोलह लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें मई में साकेत में छह मौतें और जुलाई में रोहिणी में तीन मौतें शामिल हैं। दिल्ली फायर सर्विस के आंकड़ों के अनुसार जनवरी से सितंबर 2026 की शुरुआत तक शहर में इमारत से जुड़े तीन सौ तीस से ज्यादा कॉल आए थे, जिनमें तीस मौतें और एक सौ बीस लोग घायल हुए। 2022 से 2024 के बीच दिल्ली में ग्यारह सौ तैंतीस इमारत गिरने संबंधी घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें अट्ठानवे लोगों की जान गई। पिछले दो दशकों में दिल्ली में ऐसी घटनाओं में सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।
सत्य निकेतन जैसे इलाके दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास स्थित होने के कारण छात्रों के लिए पीजी का बड़ा केंद्र बन गए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में करीब सात लाख छात्र हैं, जिनमें से साढ़े तीन लाख से ज्यादा बाहरी राज्यों के हैं। विश्वविद्यालय के पास आधिकारिक हॉस्टल की क्षमता मात्र सात हजार से आठ हजार सीटों की ही है। इसका मतलब है कि बाहरी छात्रों में से केवल एक से चार प्रतिशत को ही हॉस्टल मिल पाता है। बाकी हजारों छात्रों को निजी पीजी या किराए के मकानों पर निर्भर रहना पड़ता है। साउथ कैंपस के कई कॉलेजों में हॉस्टल की सुविधा या तो नहीं है या बहुत सीमित है। हादसे के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने नगर निगम को निर्देश दिया कि वह अपने क्षेत्राधिकार में आने वाली सभी पीजी इमारतों का एक सप्ताह के अंदर निरीक्षण करे। कोर्ट ने छात्रों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता जताई। नगर निगम के पांच अधिकारियों को सस्पेंड किया गया। प्रशासन ने अवैध और खतरनाक इमारतों को सील करने और ध्वस्त करने का अभियान भी शुरू किया।
दिल्ली में होस्टल की भारी कमी और पीजी व्यवस्था में सुरक्षा मानकों की अनदेखी लंबे समय से चली आ रही समस्या है। कई इमारतें पुरानी हैं, बिना मंजूरी के अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई हैं और सुरक्षा जांच नियमित रूप से नहीं होती। छात्रों के अभिभावक दूर राज्यों में रहते हैं और अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं। हादसे के बाद कई छात्रों को पास की इमारतों से भी निकलना पड़ा क्योंकि उनमें दरारें आ गई थीं।
इस त्रासदी ने सरकार और प्रशासन दोनों को झकझोर दिया। मुख्यमंत्री ने घायलों और प्रभावित परिवारों से मुलाकात की तथा आर्थिक सहायता की घोषणा की। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सिर्फ निरीक्षण और सस्पेंशन से समस्या हल होगी। दिल्ली जैसे बड़े शहर में जहां हर साल लाखों छात्र पढ़ाई के लिए आते हैं, सुरक्षित और किफायती आवास की कमी एक बड़ी चुनौती है। विश्वविद्यालय परिसरों के पास पर्याप्त हॉस्टल बनाने, पीजी इमारतों के लिए सख्त मानदंड तय करने और नियमित संरचनात्मक ऑडिट कराने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है।
सत्य निकेतन की यह घटना सिर्फ एक इमारत के गिरने की कहानी नहीं है। यह उन व्यवस्थागत खामियों की कहानी है जो छात्रों की जान को जोखिम में डालती हैं। कमजोर नींव, अवैध मरम्मत, पानी का जमाव और प्रशासनिक लापरवाही ने मिलकर एक ऐसी आपदा को जन्म दिया जिसमें सात परिवार हमेशा के लिए टूट गए। आंकड़े बताते हैं कि समस्या सिर्फ एक हादसे तक सीमित नहीं है। अब जरूरत है कि इस हादसे से सबक लिया जाए और भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। छात्रों का सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करना सिर्फ परिवारों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जिम्मेदारी है।
इस हादसे में सात लोगों की जान चली गई। इनमें पांच छात्र और दो मजदूर शामिल थे। मारे गए छात्रों में अर्पित जाज (19 वर्ष, देवास मध्य प्रदेश), अभिषेक कुमार (20 वर्ष, उत्तर प्रदेश), युवराज सोनी (20 वर्ष, दुर्ग छत्तीसगढ़), पवन कुमार (17 वर्ष, औरैया उत्तर प्रदेश) और अक्षत सिंह यादव (18 वर्ष, कटनी मध्य प्रदेश) शामिल थे। दो मजदूर सुरिंदर सिंह और परम लाल कोरी भी इस त्रासदी में मारे गए। बचाव अभियान लगभग सत्ताईस से अट्ठाईस घंटे चला। दिल्ली फायर सर्विस, एनडीआरएफ, पुलिस और अन्य एजेंसियों की टीमें मलबे में फंसे लोगों को निकालने में जुटी रहीं। कुल बारह लोगों को मलबे से बाहर निकाला गया, जिनमें से सात की मौत हो गई और पांच घायल हुए। घायलों में असगर अली, नीरज बावा, आदित्य कुमार, नितिश चिब और मोहम्मद अयान शामिल थे, जिन्हें एम्स ट्रॉमा सेंटर और सफदरजंग अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया।
इमारत का नाम होस्टल डेज था और यह लड़कों के लिए पीजी के रूप में चल रही थी। इसमें करीब पंद्रह कमरे थे और कई छात्र दो-दो या तीन-तीन के कमरों में रह रहे थे। स्थानीय लोगों के अनुसार किराया प्रति बेड लगभग बारह हजार रुपये के आसपास था। इमारत करीब पचपन वर्ग गज के प्लॉट पर बनी थी। इसका मालिकाना हक उर्मिला गुप्ता के नाम पर था, जबकि उनके पति हरिराम गुप्ता, जो वायुसेना से सेवानिवृत्त थे और उम्र अस्सी से ऊपर थी, तथा बेटा महेश गुप्ता इसे संचालित कर रहे थे। पुलिस ने हादसे के बाद इन तीनों को गिरफ्तार किया। इसके अलावा पीजी संचालक और मरम्मत का काम कराने वाले ठेकेदार को भी हिरासत में लिया गया। जांच में सामने आया कि बेसमेंट में अवैध रूप से मलबा डाला जा रहा था और दीवारें हटाई जा रही थीं ताकि जगह बढ़ाई जा सके। भारी बारिश से जमा पानी ने नींव को और कमजोर कर दिया था।
यह घटना अकेली नहीं है। दिल्ली में इस साल अब तक पांच इमारतें गिर चुकी हैं, जिनमें कुल सोलह लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें मई में साकेत में छह मौतें और जुलाई में रोहिणी में तीन मौतें शामिल हैं। दिल्ली फायर सर्विस के आंकड़ों के अनुसार जनवरी से सितंबर 2026 की शुरुआत तक शहर में इमारत से जुड़े तीन सौ तीस से ज्यादा कॉल आए थे, जिनमें तीस मौतें और एक सौ बीस लोग घायल हुए। 2022 से 2024 के बीच दिल्ली में ग्यारह सौ तैंतीस इमारत गिरने संबंधी घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें अट्ठानवे लोगों की जान गई। पिछले दो दशकों में दिल्ली में ऐसी घटनाओं में सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।
सत्य निकेतन जैसे इलाके दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास स्थित होने के कारण छात्रों के लिए पीजी का बड़ा केंद्र बन गए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में करीब सात लाख छात्र हैं, जिनमें से साढ़े तीन लाख से ज्यादा बाहरी राज्यों के हैं। विश्वविद्यालय के पास आधिकारिक हॉस्टल की क्षमता मात्र सात हजार से आठ हजार सीटों की ही है। इसका मतलब है कि बाहरी छात्रों में से केवल एक से चार प्रतिशत को ही हॉस्टल मिल पाता है। बाकी हजारों छात्रों को निजी पीजी या किराए के मकानों पर निर्भर रहना पड़ता है। साउथ कैंपस के कई कॉलेजों में हॉस्टल की सुविधा या तो नहीं है या बहुत सीमित है। हादसे के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने नगर निगम को निर्देश दिया कि वह अपने क्षेत्राधिकार में आने वाली सभी पीजी इमारतों का एक सप्ताह के अंदर निरीक्षण करे। कोर्ट ने छात्रों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता जताई। नगर निगम के पांच अधिकारियों को सस्पेंड किया गया। प्रशासन ने अवैध और खतरनाक इमारतों को सील करने और ध्वस्त करने का अभियान भी शुरू किया।
दिल्ली में होस्टल की भारी कमी और पीजी व्यवस्था में सुरक्षा मानकों की अनदेखी लंबे समय से चली आ रही समस्या है। कई इमारतें पुरानी हैं, बिना मंजूरी के अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई हैं और सुरक्षा जांच नियमित रूप से नहीं होती। छात्रों के अभिभावक दूर राज्यों में रहते हैं और अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं। हादसे के बाद कई छात्रों को पास की इमारतों से भी निकलना पड़ा क्योंकि उनमें दरारें आ गई थीं।
इस त्रासदी ने सरकार और प्रशासन दोनों को झकझोर दिया। मुख्यमंत्री ने घायलों और प्रभावित परिवारों से मुलाकात की तथा आर्थिक सहायता की घोषणा की। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सिर्फ निरीक्षण और सस्पेंशन से समस्या हल होगी। दिल्ली जैसे बड़े शहर में जहां हर साल लाखों छात्र पढ़ाई के लिए आते हैं, सुरक्षित और किफायती आवास की कमी एक बड़ी चुनौती है। विश्वविद्यालय परिसरों के पास पर्याप्त हॉस्टल बनाने, पीजी इमारतों के लिए सख्त मानदंड तय करने और नियमित संरचनात्मक ऑडिट कराने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है।
सत्य निकेतन की यह घटना सिर्फ एक इमारत के गिरने की कहानी नहीं है। यह उन व्यवस्थागत खामियों की कहानी है जो छात्रों की जान को जोखिम में डालती हैं। कमजोर नींव, अवैध मरम्मत, पानी का जमाव और प्रशासनिक लापरवाही ने मिलकर एक ऐसी आपदा को जन्म दिया जिसमें सात परिवार हमेशा के लिए टूट गए। आंकड़े बताते हैं कि समस्या सिर्फ एक हादसे तक सीमित नहीं है। अब जरूरत है कि इस हादसे से सबक लिया जाए और भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। छात्रों का सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करना सिर्फ परिवारों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जिम्मेदारी है।
10th September, 2026
