राजेन्द्र द्विवेदी-देश की राजनीति एक बार फिर महिला आरक्षण, जाति जनगणना, लोकसभा-विधानसभा परिसीमन और वन नेशन वन इलेक्शन मुद्दों के चक्रव्यूह में फंसने जा रही है जो अगले आठ वर्षों तक—यानी 2034 तक—हर राजनीतिक दल, चाहे वह राष्ट्रीय हो, क्षेत्रीय हो या स्थानीय, को निरंतर “सियासी नृत्य” करने पर मजबूर करेंगे। ये मुद्दे इतने जटिल, इतने भावनात्मक और इतने प्रतिष्ठा से जुड़े हैं कि हर दल की साख, हर राज्य का भविष्य और हर वोटर का हित इनमें उलझा हुआ है।
अभी संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र (16-18 अप्रैल 2026) शुरू हो गया है, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष में बहस चल रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आधी आबादी के हित के लिए दलगत राजनीति से ऊपर उठकर महिला आरक्षण संसोधन का समर्थन करने की अपील की है साथ में उन्होंने विपक्ष को चेतावनी भी दी है कि अगर विरोध करेंगे तो राजनीति नुकसान होगा। विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री पिछड़ें एवं दलित महिलाओं को उनका हक नहीं देना चाहते। जाति जनगणना 2026 में शुरू हो रही है और 2027 में पूरी हो जाएगी तो ऐसे में 2011 की जनसंख्या के आधार पर परिसीमन और महिलाओं को आरक्षण देना न्यायसंगत नहीं है।
1. महिला आरक्षण: नारी शक्ति का वादा और उसका क्रियान्वयन
2023 के विशेष सत्र में “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” के रूप में महिला आरक्षण विधेयक पारित हो चुका था। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का ऐतिहासिक कदम था। लेकिन इसकी प्रभावी तारीख जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन पर टिकी हुई थी। अब सरकार इस सत्र में संविधान संशोधन (131वां संशोधन) और परिसीमन विधेयक लाकर इसे तेज करने की कोशिश कर रही है। लक्ष्य है कि 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले ही यह आरक्षण लागू हो सके। विपक्ष का आरोप है कि इसमें ओबीसी और एससी महिलाओं के लिए अलग आरक्षण का प्रावधान पर्याप्त नहीं है, जबकि दक्षिण के राज्य परिसीमन से अपने प्रतिनिधित्व के घटने का डर जता रहे हैं। विरोध की हिम्मत शायद किसी में नहीं है, लेकिन बारीकियों पर लड़ाई निश्चित है।
2. परिसीमन: 1971 से 2011, और फिर आगे?
वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटें 1971 की जनगणना के आधार पर फ्रीज हैं (84वें संशोधन के तहत 2026 तक)। अब सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कर लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 850 तक ले जाने का प्रस्ताव लायी है।
यह बदलाव उत्तर भारत के पक्ष में जाएगा, जहां जनसंख्या वृद्धि अधिक रही है। दक्षिण के राज्य—तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना—इससे चिंतित हैं। उनका तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को सजा नहीं मिलनी चाहिए। परिसीमन के साथ महिला आरक्षण की सीटों का भी नया बंटवारा होगा, जो पूरे राजनीतिक समीकरण बदल देगा।
3. जाति जनगणना: सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा सवाल
2026-27 में शुरू होने वाली अगली जनगणना में पहली बार पूर्ण जाति गणना शामिल होने जा रही है—लगभग 90 वर्ष बाद। यह डेटा आरक्षण नीतियों, कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक न्याय के भविष्य को तय करेगा।
सवाल उठ रहा है—क्या 2011 की जनगणना और 2027 की नई जनगणना (जिसमें जाति डेटा होगा) के बीच 16 वर्ष का अंतर परिसीमन को विवादास्पद नहीं बना देगा? विपक्ष कह रहा है कि परिसीमन बिना पूर्ण जाति डेटा के अधूरा और अन्यायपूर्ण होगा। जाति जनगणना न सिर्फ ओबीसी, एससी, एसटी की सही तस्वीर पेश करेगी, बल्कि राजनीतिक दलों की रणनीति को भी पूरी तरह बदल देगी।
4. वन नेशन वन इलेक्शन: एक साथ चुनाव का सपना
एक देश, एक चुनाव का विचार भी इन चार मुद्दों में शामिल है। लोकसभा, विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव लंबे समय से चर्चा में है। इसका उद्देश्य चुनावी खर्च कम करना, विकास कार्यों में व्यवधान रोकना और राजनीतिक स्थिरता लाना है। लेकिन आलोचक इसे संघीय ढांचे पर हमला मानते हैं। क्षेत्रीय दल अपनी अलग पहचान और स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखते हुए इसका विरोध कर सकते हैं।
अगले आठ वर्षों का सियासी नृत्य
ये चारों मुद्दे आपस में गुथे हुए हैं। महिला आरक्षण परिसीमन पर निर्भर है। परिसीमन जनगणना (और जाति डेटा) पर। जाति जनगणना सामाजिक न्याय की मांगों को नई ताकत देगी। और वन नेशन वन इलेक्शन पूरे चुनावी कैलेंडर को बदल देगा।
2026 से 2034 तक की राजनीति इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमेगी। उत्तर बनाम दक्षिण, सामाजिक न्याय बनाम प्रशासनिक सुविधा, लिंग समानता बनाम जातिगत समीकरण—हर तरफ तनाव होगा। राष्ट्रीय दल अपनी रणनीति को इनके अनुरूप ढालेंगे, जबकि क्षेत्रीय दल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ेंगे। भारतीय लोकतंत्र की ताकत यही है कि ये विवादास्पद मुद्दे भी अंततः संसद और जनता के बीच तय होते हैं। लेकिन अगले आठ वर्ष निश्चित रूप से “सियासी डांस” के सबसे जटिल और रोमांचक दौर साबित होंगे।
16th April, 2026
