राजेन्द्र द्विवेदी, यूरीड मीडिया- उत्तर प्रदेश के आजादी के बाद के इतिहास का विश्लेषण करें तो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि सवर्णों का चेहरा नहीं, कुर्सी होती है 'नेता'। इसलिए तमाम उतार-चढ़ाव एवं चुनौतियों के बाद भी वे मुख्यधारा में बने रहते हैं। वर्तमान में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राजपूतों के सबसे बड़े चेहरे के रूप में जाने जाते हैं। और उनके एक्शन व रिएक्शन से यह झलकता भी है। लेकिन इतिहास गवाह है कि योगी आदित्यनाथ राजपूतों के तभी तक सर्वमान्य नेता हैं, जब तक वे मुख्यमंत्री हैं या फिर भविष्य में इससे भी ऊँचे पद पर पहुँच जाएँ। जिस दिन बड़ी कुर्सी नहीं होगी, उसी दिन वे जातीय नेता के रूप में उसी तरह चिन्हित हो जाएँगे, जैसे मुख्यमंत्री के रूप में त्रिभुवन नारायण सिंह और वर्तमान में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, समाजवादी पार्टी सरकार में राजपूतों के चेहरा रहे अमर सिंह तथा कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री रहे वीर बहादुर सिंह और विश्वनाथ प्रताप सिंह शामिल हैं।
राजपूतों की तरह ब्राह्मणों की भी यही स्थिति रही है। ब्राह्मणों में भी उत्तर प्रदेश में चेहरे के तौर पर सर्वमान्य नेता न पहले कभी कोई था और न आज है। जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर समय-समय पर जो चेहरा बैठा, वही ब्राह्मणों का सबसे बड़ा नेता हो गया—चाहे वह प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत हों, कमलापति त्रिपाठी, नारायण दत्त तिवारी या श्रीपति मिश्र। यही ब्राह्मणों के नेता बन गए।
उत्तर प्रदेश में नारायण दत्त तिवारी आखिरी मुख्यमंत्री और ब्राह्मणों के राज्य-स्तरीय सर्वमान्य नेता रहे। इसके बाद कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना। इसलिए एन.डी. तिवारी के बाद आज तक उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं है। राजपूत हों या ब्राह्मण—दोनों में जातीय चेहरे जो दिखाई दे रहे हैं, उनका प्रभाव जनपद या मंडल तक ही सीमित है। पूरे प्रदेश में कोई एक चेहरा नहीं है।
कायस्थों में भी यही स्थिति रही है—कुर्सी पर जो बैठता है, वही नेता होता है। वर्तमान में नितिन नवीन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, इसलिए कायस्थों के बड़े चेहरे के रूप में मान्यता जरूर मिल रही है। जबकि पिछड़ी जातियों एवं दलितों में नेतृत्व को लेकर सवर्णों के विपरीत स्थिति है। कुर्सी पर न रहते हुए भी अखिलेश यादव यादवों के सर्वमान्य नेता हैं और मायावती आज भी मुख्यमंत्री न रहने के बावजूद दलितों की सर्वमान्य नेता हैं।
राजपूतों की तरह ब्राह्मणों की भी यही स्थिति रही है। ब्राह्मणों में भी उत्तर प्रदेश में चेहरे के तौर पर सर्वमान्य नेता न पहले कभी कोई था और न आज है। जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर समय-समय पर जो चेहरा बैठा, वही ब्राह्मणों का सबसे बड़ा नेता हो गया—चाहे वह प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत हों, कमलापति त्रिपाठी, नारायण दत्त तिवारी या श्रीपति मिश्र। यही ब्राह्मणों के नेता बन गए।
उत्तर प्रदेश में नारायण दत्त तिवारी आखिरी मुख्यमंत्री और ब्राह्मणों के राज्य-स्तरीय सर्वमान्य नेता रहे। इसके बाद कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना। इसलिए एन.डी. तिवारी के बाद आज तक उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं है। राजपूत हों या ब्राह्मण—दोनों में जातीय चेहरे जो दिखाई दे रहे हैं, उनका प्रभाव जनपद या मंडल तक ही सीमित है। पूरे प्रदेश में कोई एक चेहरा नहीं है।
कायस्थों में भी यही स्थिति रही है—कुर्सी पर जो बैठता है, वही नेता होता है। वर्तमान में नितिन नवीन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, इसलिए कायस्थों के बड़े चेहरे के रूप में मान्यता जरूर मिल रही है। जबकि पिछड़ी जातियों एवं दलितों में नेतृत्व को लेकर सवर्णों के विपरीत स्थिति है। कुर्सी पर न रहते हुए भी अखिलेश यादव यादवों के सर्वमान्य नेता हैं और मायावती आज भी मुख्यमंत्री न रहने के बावजूद दलितों की सर्वमान्य नेता हैं।
2nd February, 2026
